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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण

भारत की एकता का निर्माण

सरदार पटेल

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :350
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 62
आईएसबीएन :

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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण


यह सब चीजें हमारे करने की हैं। इसलिए मानपत्र में आपने जो लिखा है कि पीछे हमने जो कुछ किया, वही बार बार करते रहेंगे, या आपने यह किया, वह किया, इस सब चीज़ को मैं नहीं मानता। क्योंकि पीछे जो किया, वह उस समय पर ठीक था, लेकिन आज वह काम की चीज़ नहीं है। आगे तो करने का बहुत काम बाकी पड़ा है। और हमारी पिछली कार्रवाई से हमारा काम नहीं चलेगा। हमें आगे ज्यादा कमाई करनी चाहिए। इसलिए आपने जो पिछले कामों के बारे में जिक्र किया कि मैंने यह किया, वह किया, उसका अधिक महत्व नहीं है। मैं जानता हूँ कि तब मेरे साथ गांधी जी का आशीर्वाद था और तब उनकी सलाह भी मुझे मिलती थी। उससे मैं जो काम करता था, वह सब काम ठीक हो जाता था। लेकिन उसके बाद जिस प्रकार का काम वह चाहते थे, वैसा काम नहीं हुआ। इसका मुझ को दर्द है। इसी की मुझे तकलीफ है। इसलिए मैं आप लोगों से बड़ी इज्जत से यह कहना चाहता हूँ कि आप लोगों को जो स्वराज मिला और रेस्पान्सिबल गवर्नमेंट (उत्तरदायी सरकार) मिली, वह तो बहुत अच्छा हुआ, वह बहुत ठीक हुआ। लेकिन उससे आप लोगों के ऊपर जो जिम्मेवारी आ पड़ी है अगर उसे आप नहीं समझेंगे, तो आपको बहुत तकलीफ होगी। और जब हमारे लोग तकलीफ में आ जाएंगे, तब वे कहेंगे कि वह जो पहला राज्य था, ठीक था। तब आपको बहुत मुश्किल पड़ेगी और हमको भी मुश्किल का सामना करना पड़ेगा।

अब हिन्दुस्तान में हम किसी जगह पर इस प्रकार का अलग राज्य नहीं रहने देना चाहते, जो सब के साथ न चले। अब तो सारे हिन्दुस्तान को एक साथ चलना है। कोई आगे और कोई पीछे नहीं रह सकता। हम सब को एक साथ चलना है। तो सब राज्यों में, सब रियासतों में, सब स्टेटों में, सब प्रान्तों में करीब-करीब एक ही प्रकार का राजतन्त्र बँध जाए और सबकी प्रगति एक साथ चले। एक-एक जगह पर खड़ा रहे और दूसरा किसी और जगह पर, तो काम नहीं चल सकता। तो इस काम में आप सब लोगों का साथ हमें चाहिए।

एक उदार राजतन्त्र की प्रथा मैसूर में चली आ रही है। मैसूर में काम करनेवाले लोग कुशल और अनुभवी हैं। उन लोगों को सावधान करने की मुझे कोई जरूरत नहीं। वह सब समझते हैं। लेकिन तो भी, सब समझते हुए भी, देश की जो पहली ज़रूरियात हैं, उन्हें अपने सामने रखना चाहिए। क्योंकि आज दुनिया अजीब हालत में पड़ी हुई है। अगर हम अपनी गदा न सम्भालें तो जिस जगह पर हमें दुनिया में रहना चाहिए, उस जगह पर हम नहीं पहुँच सकते। हमारे मुल्क के दो दुकड़े हो गए, तो भी यह एक बहुत बड़ा मुल्क है। इसमें बहुत धन पड़ा है और यहाँ के लोग बहुत समझदार हैं। सब मिलकर और झगड़े छोड़कर अगर अपना काम करने लगें, तो हमें किसी चीज की कमी न रहे। यों मुझे कोई डर की बात मालूम नहीं होती। मैं जो लोगों को सावधान करता हूँ, तो उसका यह मतलब नहीं है कि मेरे दिल में कोई अविश्वास है, या शंका है। लेकिन मैं लोगों को हमेशा जाग्रत रखने का काम करता हूँ। क्योंकि यदि हमें अपने मुल्क को आगे बढ़ना है तो हमें हमेशा जागृत रहना चाहिए। हमारा मुल्क बहुत बड़ा है और हम पर जो ज़िम्मेवारी एकदम आकर पड़ी है, वह बहुत बड़ी है। आजतक जो बोझ हमने उठाया है, वह इतना भारी बोझ नहीं था। आज से पहले तक हम जो काम करते थे, वह दूसरी प्रकार का था। लेकिन आज जो काम हम पर आकर पड़ा है, वह इतना जबरदस्त काम है कि उसमें आप सब का साथ और सहयोग न हो तो हमारा काम चल ही नहीं सकता।

जब हमने इतने लोगों के प्रतिनिधित्व का दावा कर लिया, तब हमारा कर्तव्य हो जाता है, हमारा यह धर्म हो जाता है कि हमारे देश में जो गरीब लोग हैं, उनको पहला लाभ मिले, उसके बाद उन लोगों को भाग मिलना चाहिए जो अपनी आवाज़ नहीं पहुँचा सकते हैं। जो मजबूत लोग हैं, जो धनवान हैं, कुशल हैं, पढ़े-लिखे हैं, वह अपना काम किसी-न-किसी तरह 'निपटा सकते है? वे राजदरबार मे पहुँच सकते हैं। लेकिन जो गरीब लोग हैं, मजदूर लोग हैं, जो झोपड़ियों में रहते हैं, उनकी आवाज कहीं पहुँच नहीं सकती। इसलिए डेमोक्रेसी (जनतन्त्र) में जो जनता के प्रतिनिधि या नेता लोग हैं उनका यह धर्म हो जाता है कि उनका पहला ध्यान देश के गरीबों की तरफ जाए।

अब आपकी म्युनिसिपैलिटियों के बारे में भी राज्य की ओर से धन की काफी मदद होती होगी। लेकिन आपको हमेशा यह समझना चाहिए कि म्युनिसिपैलिटी का यह कर्त्तव्य होता है कि वह अपने को सेल्फ सफिशन्सी (आत्म निर्भरता) की ओर ले जाए। राज्य आज तो मदद दे, और कल न दे? अगर राज्य में ऐसी शक्ति पैदा हो जाए, जो कहे कि हमारा धन देहात में से आ जाता है, उसे शहर में क्यों खर्च किया जाए? गाँववाले कहें कि हमारा हिस्सा हम को मिलना चाहिए। यह चीज़ डेमोक्रेसी (जनतन्त्र) में पैदा होनेवाली है, क्योंकि देहात को जागृत करना ही पंचायत राज्य का अर्थ है। तो शहरों में रहनेवाले बहुत से लोग अगर अपनी जिम्मेवारी न समझें और हमेशा यही शिकायत करते रहें कि हम पर कर का बोझ ज्यादा है, तो म्युनिसिपैलिटी का कारोबार कभी अच्छा नहीं चलेगा। उसकी तिजोरी हमेशा ठीक रहनी चाहिए और सब शहरियों को समझना चाहिए कि म्युनिसिपैलिटी हमारी है। तो स्वराज में हमेशा यह तैयारी रखनी चाहिए कि अपना बोझा हमें खुद उठाना है, क्योंकि अब तो बोझा उठानेवाला न केवल कोई महाराजा है और न केवल कोई आफिसर। हमारे यहाँ किसी एक व्यक्ति की पूरी पावर (शक्ति) नहीं है कि वह जो चाहे, सो कर सके। तो हम सब को यह बोझ मिल कर उठाना है। इसके लिए सब को अपना-अपना जेब थोड़ा-थोड़ा काट कर रखना पड़ेगा। हाँ, यह सम्हालना हमारा काम है कि आपके पैसे का खर्च ठीक होता रहे। राज्य की एफिशन्सी (कार्यदक्षता) तभी कायम रहेगी, जब हमारे प्रतिनिधि जागृत रहें और हम उनको जागृत रक्खे। यह दोनों बातें साथ-साथ होंगी, तभी काम चलेगा। यदि हम निगरानी छोड़ देंगे, तो उससे काम नहीं चलेगा। म्युनिसिपैलिटी की एफिशन्सी भी तभी कायम रहेगी।

मैंने जो चन्द बातें आपके सामने रखी हैं वे अनुभव की बातें हैं। मैंने म्युनिसिपैलिटी में काफी काम किया है और मैं आप से कहना चाहता हूँ कि म्युनिसिपैलिटी का काम करने में मन की और दिल की जितनी शान्ति रहती है, वह दूसरी जगह पर नहीं रहती। पौलिटिक्स (राजनीति) का क्षेत्र बड़ा मैला है। यह मैला काम है, गन्दा काम है। म्युनिसिपैलिटी को लोग कंजर्वेन्सी (मलनिवारण) का काम कहते हैं। लेकिन म्युनिसिपैलिटी में जितनी गन्दगी है, उसे कहीं ज्यादा गन्दगी पालिटिक्स (राजनीति) में है। म्युनिसिपैलिटी में तो गटर्स (नालियां) ही साफ करने की है, लेकिन राष्ट्रीय क्षेत्र के भीतर जो गटर्स हैं, वे बहुत बड़े डर की चीज़ हैं। उनको साफ करना बहुत ही कठिन काम है। जो अपना दिल साफ न रक्खे, वह राज्य का बोझ नहीं उठा सकता।

तो मैंने म्युनिसिपैलिटी में बहुत सालों तक काम किया। उन दिनों मुझे रात को बहुत अच्छी नींद आती थी। क्योंकि मैं जब शहर की सफाई का या शहर के गरीब लोगों की सेवा का काम करता था, तो मुझे शाम को यह अनुभव होता था कि मैंने दिन भर में कुछ काम किया है। इससे बहुत अच्छी नींद आती थी। इसलिए मैं कहता हूँ कि म्युनिसिपैलिटी का काम बहुत ही अच्छा बल्कि सब से अच्छा काम है। इसलिए म्युनिसिपैलिटी के प्रमुख को भंगी कहते हैं। वह भंगी की प्रतिमा है। वह झाड़ू का काम करनेवाला है। इसका मतलब यह है कि शहर को साफ रखना और शहर को सुखी रखना, यह म्युनिसिपैलिटी के अधिकारियों का कर्तव्य है।

आप लोगों ने जो मानपत्र मुझे दिया, इसलिए मैं आपका शुक्रिया अदा करता हूँ। बाकी मुझे मानपत्र की क्या जरूरत है? आप लोगों का इतना प्रेम और इतना मान का भाव है, वही मेरे लिए मानपत्र है। तो भी जिस प्रेम से आपने मेरा स्वागत किया, उसके लिए मैं आपका ऋणी हूँ। आप जो पूजा का पत्थर या (नींव) रखने का काम मुझ से करवाते हैं वह बहुत कड़ा बोझ का काम है। और मैं इस बोझ से काँपता हूँ। यह काम कौन कर सकता है? आज आप इसकी स्थापना कर रहे हैं, तो हर रोज आपको इस स्थान को और इस मूर्ति को याद रखना पड़ेगा। और उसे ध्यान में रखते हुए अपना दिल साफ रखकर आपको अपना काम करना होगा। यदि आप यह न करें, या आपके किसी काम से उनके नाम को कोई लाज लगे, तो आज की इस प्रतिष्ठा से कोई फायदा नहीं होगा। मैं उम्मीद करता हूँ कि जब आपने यह काम उठाया है, तो आपने उसकी पूरी जिम्मेवारी को समझ लिया है। उनका आशीर्वाद आप लोगों को मिले, यही मेरी इच्छा है।

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    अनुक्रम

  1. वक्तव्य
  2. कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
  3. लखनऊ - 18 जनवरी 1948
  4. बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
  5. बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
  6. दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
  7. दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
  8. दिल्ली - 18 फरवरी 1948
  9. पटियाला - 15 जुलाई 1948
  10. नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
  11. गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
  12. बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
  13. नागपुर - 3 नवम्बर 1948
  14. नागपुर - 4 नवम्बर 1948
  15. दिल्ली - 20 जनवरी 1949
  16. इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
  17. जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
  18. हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
  19. हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
  20. मैसूर - 25 फरवरी 1949
  21. अम्बाला - 5 मार्च 1949
  22. जयपुर - 30 मार्च 1949
  23. इन्दौर - 7 मई 1949
  24. दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
  25. बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
  26. कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
  27. दिल्ली - 29 जनवरी 1950
  28. हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950

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