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भारत की एकता का निर्माण

सरदार पटेल

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :350
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 62
आईएसबीएन :

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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण


(२०)

पंजाब युनिवर्सिटीं की ओर से डाक्टरेट मिलने पर
अम्बाला
५ मार्च, १९४९

सज्जनो!
आप लोगों की तरफ से जब मुझे पदवीदान का निमन्त्रण मिला तो मैं सोचता रहा कि मुझे क्या करना चाहिए। क्योंकि जिन लोगों को आज पदवीदान देना है, उनमें बहुत से ऐसे हैं, जिन्होंने पदवी पाने के लिए बड़ी मेहनत की है, यह उनका हक है। मैं उन्हें मुबारकबाद देता हूँ। लेकिन तीन आदमियों को आपने शोभा की पदवी देने के लिए चुना है। उनमें से दो ऐसे हैं, जिन्होंने आपके प्रान्त की मुसीबत की हालत में बहुत सेवा की। इनमें से एक ने पहले भी सेवा की थी। दूसरे, जो आपके, कुलपति (चांसलर) हैं, उनका भी अधिकार है। उन्हें डिगरी क्यों न मिलें? (तालियाँ)

लेकिन इस जगह पर यह पदवी प्राप्त करने की कोई योग्यता मुझ में नहीं है। इसलिए मै दुविधा में था कि मुझे क्या करना चाहिए। दूसरी ओर मुझे ख्याल आया कि मुझे घायल पंजाब से निमन्त्रण मिला है और मेरा धर्म है कि मैं उसको स्वीकार करूँ। (तालियाँ) इसलिए मैंने स्वीकार कर लिया। आपकी यूनिवर्सिटी का अभी प्रारम्भ ही हुआ है, प्रारम्भ ही में आपने मुझे डिग्री दी। इसे मैं बड़ी इज्जत समझता हूँ। इसके लिए मैं आप सब को धन्यवाद देता हूँ।

हमारे प्रान्त पर जो मुसीबत पड़ी, उसे हम कैसे भूल सकते हैं। अभी यह जख्म ताजा है। लेकिन इस समय के बाद भी, जब यह जख्म ठीक हो जाएगा, तब भी हम कभी नहीं भूलेंगे कि हमारे सूबे की युनिवर्सिटी की शुरू-शुरू में क्या हालत थी। इस बात को हम कभी भूल नहीं सकते। न भूलना चाहिए। क्योंकि आजकल हम पर बोझ पड़ा है। हमें सोचना है कि भविष्य के लिए हमें अपने मुल्क, अपनी युनिवर्सिटी और अपने सूबे के लिए क्या करना है।

मैंने बहुत जगहों पर युनिवर्सिटी के विद्यार्थियों को डिग्रियाँ पाते देखा है। लेकिन जिस हालत में आप आज डिग्री पा रहे हैं, वैसी हालत मैंने आज तक भी अभी न देखी थी। मैं आप के प्रति सिर्फ खाली सहानुभूति प्रदर्शन करने नहीं आया। मैं आपको यह बताने भी आया हूँ कि अब समय आया है कि हम अपना रास्ता देख लें। हमें क्या करना है और हम क्या कर सकते हैं, यह भी हमें देखना है। हमारे सामने भविष्य के सम्बन्ध में कौन-सा चित्र होना चाहिए। पंजाब हिन्दुस्तान का दिल है। उसे जख्म लगा है, और जब तक यह ठीक नहीं होगा, तब तक हिन्दुस्तान बेचैन रहेगा। तब तक वह कोई और काम नहीं कर सकेगा। इसलिए आपको जल्द ही अपना दिमाग ठीक करना है। अपने सूबे का दिमाग ठीक करना है।

हमको जो जख्म लगा है, वैसा जख्म इतिहास में कितने ही मुल्कों को लगा। लेकिन अब हमें इस चीज़ को ठीक जगह रख कर सोचना है। यदि हमें आगे चलना है, तो हमें गुस्सा छोड़ देना चाहिए और सावधान बनना चाहिए। चोट लगे, तो गुस्सा भी आता है। कितनी ही गलतियाँ हुईं, बुराइयाँ हुई, जिन्हें हमने बरदाश्त किया। हमें अच्छी अच्छी चीजें छोड़नी पड़ी। अपना सारा माल-मत्ता और जायदाद हमें छोड़नी पड़ी। हमारे बहुत-से आदमियों ने दुख उठाया। सूबा छोड़ा। अपना सभी कुछ छोड़ा। इस पर भी हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि रोने से कोई फायदा नहीं। अब हमें सोचना है कि हमारा क्या फर्ज है। जितना हिस्सा हमारे हक में आया है, उसे ठीक करना है। और यह आसान काम नहीं। यह बड़ा मुश्किल काम है।

लेकिन मैं मानता हूँ कि पंजाबी बड़े बहादुर हैं। जो दुख आपके सिर पर पड़ा वह और लोगों पर पड़ा होता, तो वे उसे उठा न सकते। लेकिन आप में यह हिम्मत है। और अगर आप तै कर लें, तो जैसा लाहौर था, पंजाब में कई दूसरे शहर थे, मिंटगुमरी का बागीचा था, और भी कितनी ही जगहें थीं वैसे शहर और वैसी जगहें आप यहाँ भी बना सकते हैं। क्योंकि आप में इतनी हिम्मत है आप में ऐसी ताकत है। मैं मानता हूँ कि जैसी आफत आप पर पड़ी दूसरे उसे बरदाश्त न कर सकते और पागल हो जाते। कोई और होता, तो हिन्दुस्तान को उठने ही न देता। जो बहादुरी आपने दिखाई है, उसके लिए मैं आपको सच्चे दिल से मुबारकबाद देता हूँ। आपने कितना दुख उठाया है। लेकिन आपने जिस तरह इतमीनान और हिम्मत से काम करके दिखाया है, हमें कम-से-कम परेशान किया है, उसके लिए भी मैं आपका शुक्रिया करता हूँ। हां, हम कुछ कर नहीं सके। जब पंजाब से भागे हुए रिफ्यूजी आए, तो मैं उन्हें रिफ्यूजी नहीं मानता। मैं अब भी उन्हें हिन्दुस्तान के सर पर बैठनेवाले कहता हूँ। लेकिन लोग भागे-भागे आए, जहाँ भी उन्हें जगह मिली चले गए। लेकिन जिस सूबे में वे इज्जत से नहीं रह सकते थे, उसे उन्होंने खुद छोड़ दिया। यह बहादुरों का काम है और आपने यह काम किया। लेकिन हम ऐसी हालत में पड़े हैं कि जिस तरह आप की मदद करनी चाहिए थी, उतना हम नहीं कर सके। लेकिन आपने इसे भी बरदाश्त किया, इसलिए आपका धन्यवाद। आपको बहुत बड़ा जख्म लगा और उसमें से इतना खून बह गया कि अब इसमें हमें नया खून डालना है। हमारा धर्म है कि हम पंजाब को ठीक कर लें और जो कुछ गया है, उसको भूल जाएँ।

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    अनुक्रम

  1. वक्तव्य
  2. कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
  3. लखनऊ - 18 जनवरी 1948
  4. बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
  5. बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
  6. दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
  7. दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
  8. दिल्ली - 18 फरवरी 1948
  9. पटियाला - 15 जुलाई 1948
  10. नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
  11. गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
  12. बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
  13. नागपुर - 3 नवम्बर 1948
  14. नागपुर - 4 नवम्बर 1948
  15. दिल्ली - 20 जनवरी 1949
  16. इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
  17. जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
  18. हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
  19. हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
  20. मैसूर - 25 फरवरी 1949
  21. अम्बाला - 5 मार्च 1949
  22. जयपुर - 30 मार्च 1949
  23. इन्दौर - 7 मई 1949
  24. दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
  25. बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
  26. कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
  27. दिल्ली - 29 जनवरी 1950
  28. हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950

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