|
इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
|
|
||||||
स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
अब मैं आपके सामने कुछ और बातें रखना चाहता हूँ। हमारे साथी, हमारे अकाली दल के नेता मास्टर तारासिंह हैं। हमें अफसोस है कि हमें उन्हें जेल में रखना पड़ा। जो चीज हम बनाना चाहते हैं, वह उसे तोड़ते हैं। उनके दिमाग में यह बात बैठती नहीं। मैं यहाँ बैठकर अकाली लोगों से प्रार्थना करना चाहता हूँ। मैंने सदा पंजाब का साथ दिया है और अब भी साथ देना चाहता हूँ। इससे क्या फायदा कि तुम्हारी तलवार हमारी गर्दन पर बनी रहे। जब तक हिन्दुस्तान के सिपाही मेरे पास हैं, मुझे हिन्दुस्तान की रक्षा करनी है मैं पंजाब को ठीक हालत में देखना चाहता हूँ। मैं अकाली भाइयों से हाथ कर प्रार्थना करता हूँ कि ठीक रास्ते पर चलो और हमारा साथ दो। मास्टर तारासिंह को भी समझाओ। इस तरह से काम नहीं चलेगा। जब तक हम ठीक दिमाग से काम नहीं करेंगे, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा। जितनी चोट मास्टर तारासिंह को अपनी कौम के बारे में लगी है, उतनी ही चोट मुझे भी लगी है। जब हमने पंजाब की तकसीम को कबूल किया था, उस वक्त मैंने देखा था कि पंजाब का हर आदमी बँटवारा चाहता था। बँटवारे में खतरा जरूर था। लेकिन हमने फिर भी उसे कबूल कर लिया। जो कष्ट बँटवारे से आया है, उसको हमने आपस में बांटना है। लेकिन हम ही इस चीज़ को ठीक कर सकते हैं। जैसा हिन्दुस्तान है, उससे बेहतर हिन्दुस्तान हम बना सकते हैं।
जो रुकावट हमारे रास्ते में थी, वह अब दूर हो गई है। विदेशी हुकूमत जब तक हमारे सर पर बैठी थी, हम कुछ नहीं कर सकते थे। यह बँटवारा विदेशी हुकूमत का नतीजा ही था। मैंने सब समझकर उसे मान लिया। हमने देख लिया कि आज की हालत में यह मुसीबत हमें सर पर लेनी ही है। मेरे साथ एक-एक पंजाबी भी शरीक है। अगर आज भी कोई कहे कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान मिल जाएँ, तो मैं इससे इन्कार कर दूंगा। अभी सांस लेने दो उन लोगों को। जब उनका दिमाग ठीक हो जाएगा, तो हम इस बात को भी मान लेंगे। अभी उन लोगों को वहाँ ही रहने दो। लेकिन मास्टर तारासिंह बार-बार कहते हैं कि हमें पाकिस्तान खत्म करना है। यह बात ठीक नहीं। पहले अपना घर तो ठीक कर लो। अगर पाकिस्तान ठीक हो जाए, तो इससे भी हमारा बोझ कम हो जाएगा। जहाँ हमारी इज्जत नहीं, वहाँ हम क्यों जाएँ। पाकिस्तान कोई इस तरह से जा सकता है? क्या आप समझते हैं कि पाकिस्तान को हम चाकू और छुरी से ले सक्ते हैं? हमने तो अपने मुल्क का हिस्सा करके उन्हें दे दिया, कि जाओ यह तुम्हारा हिस्सा है। अब अगर कुछ करना है, तो अक्ल से करो। क्रोध से यह काम नहीं करना चाहिए। यह क्रोध का रास्ता गलत है। इस चीज पर तो हम दोनों के दस्तखत हैं। कई लोग कहते हैं कि दिल्ली जत्था भेजो। आजाद हिन्दुस्तान अभी एक साल का बच्चा है। ऐसी क्रोधभरी बातें कर वे खुदकुशी करना चाहते हैं। क्या एक छोटे-से बच्चे को, जिसमें चलने की ताकत भी नहीं आई, हम दौड़ाएँ?
मैंने जो पदवी आपसे ली है, उसे मैने इसलिए कबूल कर लिया कि आप लोगों समझाने का मौका मुझे मिलो। इस तरह मेरा काम हल्का हो सकता है। मैंने बहुत साल जेल काटी है, वहाँ जितना आराम था, इतना अब भी मुझे नहीं है। मैं मास्टर तारासिंह के साथ जेल में बैठकर खुश हूँगा, क्योंकि वहां मुझे शान्ति मिलेगी। मैंने अपने हाथ से मास्टर तारासिंह को जेल भेजा है जिससे मुझे बहुत दुख हुआ। इतनी शर्म जिन्दगी में मुझे कभी नहीं आई थी। जो लोग कहते हैं कि हम जत्था भेजेंगे, वे सोचें कि इससे क्या होगा। मैं तो इस बोझ से छुटकारा चाहता हूँ। लेकिन मेरी जगह पर जो कोई भी आएगा, वह भी यही करेगा। अगर वह ऐसा न करेगा, तो मुल्क तबाह हो जाएगा। मैंने संघवालों को भी जेल में भर दिया। लोग कहते थे कि हिन्दुस्तान में एक ऐसा आदमी है जो हर शख्स का पक्ष लेता है। कुछ हद तक वे ठीक कहते थे। जैसा भाषण सरदार तारासिंह देते हैं, वैसा मैं भी दे सकता हूँ। उस भाषण से कुछ लोग पागल ज़रूर हो जाएँगे। यह समय लड़ने का नहीं है। सिख अलग अलग क्यों बैठे हैं? वें एक क्यों नहीं हो जाते? मैं उन नौजवानों को, जिन्हें पदवी मिली, समझाना चाहता हूँ कि उनका क्या फर्ज है। हम सिख और हिन्दू आपस में क्यों लड़े? क्या इस बात पर कि हमको इतना टुकड़ा अलग चाहिए? हमने जो इतनी मुसीबत उठाई, इतने लोग बेइज्जत हो गए, वह सब क्या इसीलिए कि हम आपस में एक दूसरे का गला काटें? कांग्रेस में आ जाओ और जो चाहो ले लो। अलग होकर हिन्दुस्तान को पहले ही नुकसान हुआ है। मैं कहता हूँ, हमारा समय तो पूरा हो गया। मैं अब ७४ साल का बूढ़ा हो गया हूँ। पेंशन लेकर मैं शान्ति से बैठकर ईश्वर का नाम लेना चाहता हूँ। लेकिन वे मुझे छोड़ते नहीं। मैं चाहता था कि गान्धी जी के साथ चला जाऊँ। मैंने कोशिश भी की थी। लेकिन लोग कहते हैं कि मुझे तो ज्यादा जीना है। वे कहते हैं कि जो काम बाकी रह गया है, उसे मुझे पूरा करना है। मेरे पास बहुत समय नहीं है। मैं चाहता हूं कि आपको मज़बूत हिन्दुस्तान मिल जाए। ऐसा हिन्दोस्तान, जिसमें किसी चीज़ की कमी न हो।
|
|||||
- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








