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इतिहास और राजनीति >> भारत की एकता का निर्माण भारत की एकता का निर्माणसरदार पटेल
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स्वतंत्रता के ठीक बाद भारत की एकता के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा देश की जनता को एकता के पक्ष में दिये गये भाषण
आप पर जो मुसीबत पड़ी, जो धन से भरा हुआ देश छोड़ कर आप इधर आ गए, उसमें आप को बड़ी तकलीफ उठानी पड़ी। क्योंकि अभी तो आप को जमीन पर ही बैठना पड़ता है। अभी रहने की झोपड़ी भी आपको नए सिरे से बनानी है। जमीन में अनाज भी पैदा करना है। अभी आप वह पैदा नहीं कर सकते। आपके कितने ही भाई दूसरे सूबों में बैठे हैं। अभी हमें करोड़ों रुपये का माल बाहर से लाना पड़ता है। आपकी असेम्बली में चार आदमी ज्यादा गए तो उस से क्या होगा। जितने आदमी असेम्बली में जाते हैं इस ख्याल से जाते हैं कि वे तुम्हारे लिए जाते हैं। और अगर वे तुम्हारे लिए काम नहीं करते, तो वे मुल्क के दुश्मन हैं।
और मैं आज भी उन्हें कहता हूँ कि आप झगड़ा छोड़ कर अपना काम करें। अगर आप छोटी-सी कौम में इतना झगड़ा करते हैं, तो हिन्दुस्तान का बोझ आप उठाएँगे? अगर आप नौकरी में रियायत चाहेंगे, तो उससे काम कैसे बनेगा?
हमारी फौज में जितने आफिसर हैं, उसमें सब से ज्यादा आपकी कौम के हैं। हमने जानबूझ कर उन्हें रखा है। छोटी-सी कौम के हाथ में हमने अपनी तलवार दे दी। क्यों? क्योंकि आपकी तलवार पर हमें पूरा भरोसा है। आज के जमाने में कोई कौम यह दावा नहीं कर सकती कि वही मार्शल है। वे दिन चले गए, जब इस तरह की बातें सोची जाती थीं। पिछली लड़ाई में मद्रास के लोगों ने, साउथ इण्डिया के लोगों ने, बड़ी बहादुरी दिखाई। आज हैदराबाद में फौज की बागडोर हमने एक बंगाली सेनापति को सौंप दी है। हमने मिलिट्री गवर्नर भी बंगाली रखा है। तो यह किसी कौम का दावा नहीं कि तलवार सिर्फ उसी के हाथ में है। आजकल ऐटम बम का जमाना है। अक्ल का जमाना है। अब अकेली जिस्मानी ताकत काम नहीं कर सकती। आज अक्ल वाले के हाथ में ही सब की बागडोर है।
मैं यह प्रार्थना करना चाहता हूँ कि हम और सब ख्याल छोड़ दें, और सोचें कि पंजाब को किस तरह बुलन्द करना चाहिए। उसी से हिन्दुस्तान ठीक होगा। जितना आपको चाहिए, ले लीजिए। मैं तो चाहूँगा कि हम सारा राज सिक्खों को दे दें। लेकिन आप ऐसा नहीं करने देते। आप आगे चलते नहीं और न हमे चलने देते हैं। हमारे मुल्क में एक मसल है-''उत्तम खेती और अधम चाकरी।'' खेती सब से अच्छी है और नौकरी सब से बुरी। खेती में न कोई खुशामद करनी पड़ती है न पाप। किसान अपने लिए मेहनत करके धरती से अनाज पैदा करते हैं खुद खाते है और दूसरों को खिलाते हैं। किसान को ही अन्नदाता कहते हैं, जो पाप नहीं करता। इसीलिए आप पंजाब की जमीन में अनाज पैदा करने की तरफ अपना ध्यान दें। तो ''उत्तम खेती, मध्यम व्यापार और अधम चाकरी।''
व्यापार के काम में थोड़ा-सा पाप तो करना पड़ता है। लेकिन सब से तुच्छ नौकरी है। उस नौकरी के लिए क्यों लड़ते हो? अगर नौकरी चाहते हो तो तलवार क्यों रखते हो?
नौकरी की इच्छा तो हम विदेशी राज में सीखे। सिक्खों में मैंने देखा है कि वे सारी दुनिया में हर किस्म का कारोबार करते हैं। विज़िनेस में, जंग में, खेती में रोजगार में हर जगह यह बहादुर कौम काम कर सकती है। इसको बेचारगी क्यों है? मैं पूछता हूँ सिक्ख क्या ऊपर से गिरे? वे कहाँ से आ गए? वे पहले कौन थे? वे हमसे अलग क्यों होना चाहते हैं? हमारी कमजोरी में भी आपने बहादुरी से काम किया। बहुत अच्छा किया। लेकिन अब तलवार का जमाना नहीं। अब कहीं दुनिया में तलवार नहीं चलती। कहीं देख लीजिए। तो अपना दिमाग ठिकाने रखो। समझो कि हिन्दुस्तान की सरकार के वजीर आपके खिलाफ नहीं हैं। अगर हों, तो यह राज कैसे रहेगा? कोई भी राजनीति के बगैर नहीं चलेगा।
हमारा पहला काम अपने इखलाक को मजबूत बनाना है। हिन्दुस्तान में जितने मज़हब हैं, अलग-अलग कौमें हैं, अलहदा-अलहदा रंग हैं, अलग-अलग कपड़े हैं, यहां तक कि बाल बनाने के ढंग भी अलहदा अलहदा हैं। इस मुल्क में सब चीजें अलहदा-अलहदा हैं। उसके लिए राजनीति जरूरी है। हमें गान्धी जी के बताए हुए रास्ते पर चलना है। साथ-ही-साथ मुल्क की हिफाजत के सामान पैदा करना भी आपका फर्ज है। दुनिया की हालत देखकर हमें सोच समझ कर काम करना चाहिए। खाली तलवार से या धमकी से काम नहीं चलेगा। इनसे तो काम बिगड़ेगा।
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- वक्तव्य
- कलकत्ता - 3 जनवरी 1948
- लखनऊ - 18 जनवरी 1948
- बम्बई, चौपाटी - 17 जनवरी 1948
- बम्बई, शिवाजी पार्क - 18 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की हत्या के एकदम बाद) - 30 जनवरी 1948
- दिल्ली (गाँधी जी की शोक-सभा में) - 2 फरवरी 1948
- दिल्ली - 18 फरवरी 1948
- पटियाला - 15 जुलाई 1948
- नई दिल्ली, इम्पीरियल होटल - 3 अक्तूबर 1948
- गुजरात - 12 अक्तूबर 1948
- बम्बई, चौपाटी - 30 अक्तूबर 1948
- नागपुर - 3 नवम्बर 1948
- नागपुर - 4 नवम्बर 1948
- दिल्ली - 20 जनवरी 1949
- इलाहाबाद - 25 नवम्बर 1948
- जयपुर - 17 दिसम्बर 1948
- हैदराबाद - 20 फरवरी 1949
- हैदराबाद (उस्मानिया युनिवर्सिटी) - 21 फरवरी 1949
- मैसूर - 25 फरवरी 1949
- अम्बाला - 5 मार्च 1949
- जयपुर - 30 मार्च 1949
- इन्दौर - 7 मई 1949
- दिल्ली - 31 अक्तूबर 1949
- बम्बई, चौपाटी - 4 जनवरी 1950
- कलकत्ता - 27 जनवरी 1950
- दिल्ली - 29 जनवरी 1950
- हैदराबाद - 7 अक्तूबर 1950








