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कामतानाथ संकलित कहानियां

कामतानाथ

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6427
आईएसबीएन :978-81-237-5247

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आम जनजीवन से उठाई गई ये कहानियां कथाकार के रचना-कौशल की वजह से ग्रहण के स्तर पर एक तरफ बतरस का मजा देती हैं तो दूसरी तरफ प्रभाव के स्तर पर उद्वेलित करती हैं...


पीने वाला व्यक्ति प्रायः स्वभाव से उदार होता है। लेकिन कार्तिक कुछ ज्यादा ही उदार है। इसीलिए धीरे-धीरे शाम के समय उसके घर आने वाले दोस्तों की संख्या कुछ ज्यादा ही बढ़ती गई। दो-एक बार तो ऐसा भी हुआ कि कुछ दोस्त-यार किसी खास अवसर, जैसे घर में मेहमान आने या फिर घर में किसी शादी-ब्याह, मंडन-छेदन आदि का बहाना बना कर उससे दो-एक बोतलें झटक भी ले गए।

यह अय्याशी एक-न-एक दिन खत्म होनी ही थी और हुई भी। तब तक कार्तिक ने मजबूर होकर एक दूसरा रास्ता निकाल लिया था। अब मोरारजी भाई की अकल को रोया जाए या रामनरेश यादव के, जो उन दिनों प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, दिमाग की दाद दी जाए कि यह नशाबंदी पूरे प्रदेश में न लागू करके कुछ चुने हुए क्षेत्रों में ही लाग की गई थी। यानी कानपुर और लखनऊ तो ड्राई थे, लेकिन फतेहपुर, बिंदकी और बाराबंकी में खुले आम शराब बिक रही थी। अतः कुछ लोगों ने इसमें भी बिजनेस ऐंगिल ढूंढ़ लिया था और चोरी-छिपे फतेहपुर या बिंदकी से शराब लाकर कानपुर में उसे महंगे दामों में बेच रहे थे। कार्तिक के घर के सामने रघुबीर पानवाला भी, जहां से कार्तिक पान-सिगरेट आदि लिया करता था, यह धंधा कर रहा था।

कार्तिक को यह पता चला, तो उसने बतौर एहतियात अपना स्टॉक खत्म होने से पहले ही रघुवीर से शराब लेनी शुरू कर दी। असलियत में उसने अपनी तमाम उदारता के बावजूद-और फिर उदार-से-उदार आदमी भी ऐसे लाखैरे दोस्तों से, जो रोज ही फोकट की शराब पीने आ जाते हों, एक दिन आजिज आ ही जाएगा-अपना स्टॉक छिपा लिया था। अब दोस्त भी लाख बेशर्म हों, कुछ-न-कुछ लाज तो निभानी ही पड़ेगी। सो अब दोस्तों के उदार होने की बारी थी। अतः बारी-बारी से दोस्तों ने पैसे देने शुरू किए और रघुबीर की दुकान से थैले में लपेट कर बोतल आने लगी।

तभी एक दिन रात के एक-डेढ़ बजे रघुबीर के घर पुलिस का छापा पड़ा-दुकान के पीछे ही घर था-और रघुबीर महाशय हथकड़ी पहन कर जेल पहुंच गए। मजबूरन कार्तिक को दोबारा अपने घटे हुए स्टॉक का सहारा लेना पड़ा। लेकिन इतनी चालाकी उसने जरूर बरती कि अब वह पूरी बोतल कभी भी बाहर कमरे में नहीं रखता। खाली बोतलों की कमी तो थी नहीं उसके यहां। अतः वह नई बोतल खोल कर उससे पीने भर की किसी खाली बोतल में भर लेता तथा उसे लेकर बाहर कमरे में बैठ जाता और किसी दोस्त के आने पर “यार, बस इतनी ही है", कह कर माफी मांग लेता या फिर उसी में से एक-आध पेग उसे भी पिला देता। तभी कुदरत के इस नियम के अंतर्गत कि जो चीज इस्तेमाल की जाएगी, घटेगी ही, एक दिन वह भी आया कि कार्तिक का स्टॉक वाकई और बिल्कुल खत्म हो गया।

लेकिन कार्तिक ने तो कसम खाई थी कि वह किसी भी कीमत पर पीना बंद . नहीं करेगा। बंद कर देता, तो उसे मोरारजी भाई से हार माननी पड़ती और शराब पीने वाला आदमी पेशाब पीने वाले आदमी से हार मान जाए, यह उसे मंजूर नहीं था। अतः वह बराबर नयी-नयी तिकड़मों की खोज में रहता और जल्द ही उसने शहर में जगह-जगह टिंचर-जिंजर से लेकर अवैध देसी अथवा विलायती शराब बिकने के कितने ही अड्डे खोज लिए। एक और खोज भी की हमने। वह थी डाबर की "मृत संजीवनी सुरा", जिसमें खासी मात्रा में अल्कोहल होता है और जो पीने वालों के लिए मोरारजी भाई के विरुद्ध इस धर्मयुद्ध में एक कारगर हथियार की तरह काम आ रही थी। कार्तिक भी इस बात पर उतर आया था कि कसम बरकरार रहे, चाहे जो पीना पड़े। आखिर यह देश महान ऋषियों-मुनियों का देश है, जो किसी भी बात पर जिद पकड़ लेते थे तो एक टांग पर वर्षों खड़े रहते थे। सांप बिच्छू उनके शरीर में अपने बिल बना लेते थे। मगर वह जिद नहीं छोड़ते थे। जबकि यहां तो सिर्फ पीने की बात थी। मजबूरी में ही सही, कार्तिक इस हद पर उतर आया था कि जिस पेय को भी शराब या दारू की संज्ञा दी जा सकती हो, या फिर जिसके पीने से नशा हो, उसे वह अपने धर्मयुद्ध में इस्तेमाल करने से हिचकेगा नहीं। क्या इतिहास में ऐसे प्रमाण नहीं हैं कि अस्त्र टूट जाने पर योद्धाओं ने रथ के पहियों तक से युद्ध किया है? महाभारत में अभिमन्यु ने ही रथ के पहिये को अपना अस्त्र बनाया था।

जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं, कार्तिक के इस धर्मयुद्ध में मैं भी किसी सीमा तक उसके साथ शामिल था। अतः यह सारी बातें मेरे ऊपर भी कमोबेश उसी तरह लागू थीं, जिस तरह कार्तिक पर। अतः हम फेरबदल कर कभी टिंचर-जिंजर, तो कभी देसी शराब या मृत संजीवनी सुरा का सेवन करने लगे। एक महोदय तो, जिनके पास डॉक्टरी का कोई डिप्लोमा या सर्टीफिकेट था, उसे बाकायदा फ्रेम में मढ़ा कर अपने कमरे में लगा कर टिंचर-जिंजर या शायद होम्योपैथिक का कोई आउंस बेचने लगे थे। कमरे की अलमारी में दो और चार आउंस की शीशियां पहले से ही भरी रखी रहतीं, जिन पर कागज की खुराक वाली चिप्पी भी लगी रहती। यह बात और थी कि उनके मरीज बिना मर्ज का कोई जिक्र किए उनसे दवा खरीदते और सारी खुराक वहीं डॉक्टर साहब के दवाखाने में एक बार में ही खाली करके शीशी वहीं छोड़कर बाहर सड़क पर खड़े चाट के ठेले पर चाट खाने लगते।

आपकी अनुमति से थोड़ा विषयांतर मैं फिर कर रहा हूं। घटना मृत संजीवनी सुरा से संबंधित है। हमारे एक दोस्त हैं विनय कुमार त्रिपाठी। हमारे इस धर्मयुद्ध में उनका भी कुछ सहयोग था। पक्के कामरेड तो वे नहीं थे, हां, फेलो ट्रैबलर की संज्ञा उन्हें जरूर दी जा सकती थी। उनके साथ समस्या केवल इतनी थी कि उनकी पत्नी शराब से बेइन्तहा चिढ़ती थी। अतः वह शराब पीने के बाद कम-से-कम आधा दर्जन इलाइची चबा कर ही घर जाते थे। प्रायः भोजन भी बाहर कर लेते और घर जाते ही पेट खराब होने का बहाना बना कर बिस्तर पर पड़ जाते। लेकिन मृत संजीवनी सरा तो टॉनिक होता है। उसके लेबुल पर पेट के अनेक विकारों का-कुछ की जानकारी तो मझे पहली बार उसका लेबुल पढ़ कर ही हुई-जिक्र है, जो उसके सेवन से ठीक हो जाते हैं। अतः त्रिपाठी जी कभी-कभी, बल्कि प्रायः घर पर ही, उसका सेवन करने लगे। अपनी पत्नी से उन्होंने कह दिया था कि किसी वैद्य ने उन्हें यह दवा बताई है। पत्नी बेचारी ने न तो शराब की बोतल कभी जिंदगी में देखी थी और न ही कभी संघी थी। उसे क्या मालूम कि वे क्या पीते हैं। और फिर सुरा की बोतल पर बड़े-बड़े अक्षरों में डाबर औषधालय छपा रहता है। अब डाबर का नाम तो इस देश में श्रीराम लागू के दूरदर्शन पर विज्ञापन आने के पहले से ही घर-घर में जाना जाता है। डाबर का च्यवनप्राश तो मिसेज त्रिपाठी स्वयं खा चुकी थीं। अतः त्रिपाठी. जी शाम को घर जाकर आराम से नहा-धोकर मृत संजीवनी सुरा की बोतल लेकर बैठ जाते। साथ में कुछ दालमोठ, सलाद, आदि भी रख लेते और बेफिक्र होकर पीते। पत्नी को कुछ संदेह हुआ, तो उसने त्रिपाठी जी की अनुपस्थिति में बोतल पर लगे लेबल को दोबारा ध्यान से पढ़ा। मगर उसमें पेट की अनेक बीमारियों के लिए रामबाण जैसा कुछ लिखा था। फिर भी उसकी शंका गई नहीं और अंततः वह एक दिन त्रिपाठी जी से पूछ ही बैठी कि यह कौन-सी-दवा है, जो दो-चार चम्मच के बजाय आधी-आधी बोतल एक बार में पी जाती है और जिसके पीने के लिए सलाद और दालमोठ भी साथ में खाना जरूरी है। त्रिपाठी जी सहसा चौंक पड़े, लेकिन उन्होंने तुरत बुद्धि से काम लिया और उसे समझाया कि बरसों का मर्ज है, इसीलिए दवा की खुराक भी ज्यादा है। वैसे दिन में चार-बार आधा-आधा कप पीना है, लेकिन बोतल लिए-लिए ऑफिस तो वह जा नहीं सकते, इसीलिए वैद्य जी की सलह पर सारी खुराक रात में एक बार में ही ले लेते हैं। रही सलाद की बात सो वैद्य जी ने कहा है कि कच्चे फल और सब्जियां जितनी खा सको, खाओ और दालमोठ तो सिर्फ जायका ठीक करने के लिए लेते हैं, क्योंकि दवा खासी कड़वी है। अब इस देश की स्त्रियों को सिवा “धन्य हैं" के अलावा क्या कहा जाए कि त्रिपाठी जी की पत्नी इस बात से पूरी तरह संतुष्ट ही नहीं हुईं, बल्कि अब त्रिपाठी जी के बिना कहे ही स्वयं ही सलाद आदि काट कर शाम से ही रख देतीं।

तो इस तरह अदल-बदल कर हम कभी टिंचर-जिंजर, कभी होम्योपैथिक का आउंस, तो कभी मृत संजीवनी सुरा, या फिर देसी शराब, माल्टा या संतरा-एक बार गुलाब की भी एक बोतल हमें मिली-पीते रहे। लेकिन देसी शराब बाद में हमें छोड़नी पड़ी। हुआ यह कि एक बार एक बोतल से मिट्टी के तेल की महक आ रही थी। खैर, उसे तो हम किसी तरह पी गए, क्योंकि धर्मयुद्ध जारी रखने की बात थी, लेकिन जब दोबारा एक बोतल में बाकायदा एक झींगुर और फिर एक दूसरी बोतल में एक काकरोच मरा मिला, तो हमने निर्णय लिया कि देसी शराब हम नहीं पिएंगे। टिंचर-जिंजर सिर पकड़ लेती थी, अतः उसे भी कभी-कभार के लिए ही रखा। मुख्यतः मृत संजीवनी सुरा पर ही निर्भर करना पड़ रहा था।

तभी कार्तिक के ऑफिस के एक चपरासी ने एक दिन उसे सूचना दी कि गंगा पार कच्ची शराब मिलती है, जो पीने में कुछ हीक जरूर मारती है, मगर होती बढ़िया है। हमने सोचा चलो, इसे भी आजमाया जाए और एक शाम मोटर साइकिल लेकर हम गंगा पार पहुंच गए। कार्तिक का चपरासी रामदुलारा हमें पूर्व निश्चित स्थान पर मिल गया। उसके कहने के मुताबिक मोटर साइकिल वहीं छोड़ कर हम उसके साथ चल दिए। सड़क पर थोड़ी दूर चलने के बाद वह हमें दाहिने हाथ एक ढाल पर उतार ले गया। ढाल से ही कुछ-कुछ बंगला फिल्मों जैसा दृश्य हमें दिखाई दिया। समाने एक जलाशय, जो वास्तव में जलाशय न होकर गंगा में आई बाढ़ के पानी के नीचे स्थान पर भर जाने से अस्थायी रूप से बन गया था; उसके दूसरी ओर वाले तट पर एक खाली नाव, खजूर के कुछ पेड़, दूर जलमग्न-सी लगने वाली कुछ झोपड़ियां और आकाश में डूबते हुए सूर्य का लाल-लाल गोला। इससे पहले कि हम समझ पाते कि दुलारा हमें कहां ले जा रहा है, उसने किसी “कालिया" को आवाज दी। दूसरे ही क्षण सिर से कमर तक नंगा एक व्यक्ति कहीं से आकर नाव पर सवार हुआ और नाव खेते हुए उसे इस पार ले आया।

“आइए बाबूजी!" दुलारा ने हमसे कहा और संभल कर नाव पर सवार हो गया।

हम भी उसके पीछे-पीछे नाव पर चढ़ गए। कालिया ने हमें उस पार ले जाकर उतार दिया। हमसे एक चवन्नी उसे दिलवा कर दुलारा हमें लगभग कीचड़ में चलाता हुआ जिस स्थान पर लाया वह अमरूद की एक बगिया थी। एक स्थान पर छप्पर जैसा कुछ पड़ा था, जिसके नीचे तख्त पर अट्ठाइस-तीस वर्ष का दुबला-सा एक युवक बैठा बीड़ी पी रहा था। सामने अमरूद के एक वृक्ष के नीचे आठ-दस वर्ष के दो लड़के जमीन पर बैठे शराब बेच रहे थे। कुछ ग्राहक वहां पहले से थे। दुलारा हमें सीधा वहीं ले गया और लड़कों से शराब देने को कहा। रुपये अडवांस ले लेने के बाद उनमें से एक लड़के ने रबड़ के एक बड़े-से ब्लाडर की छुच्छी खोल कर तीन गिलासों में शराब भर दी।

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