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कामतानाथ संकलित कहानियां

कामतानाथ

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6427
आईएसबीएन :978-81-237-5247

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आम जनजीवन से उठाई गई ये कहानियां कथाकार के रचना-कौशल की वजह से ग्रहण के स्तर पर एक तरफ बतरस का मजा देती हैं तो दूसरी तरफ प्रभाव के स्तर पर उद्वेलित करती हैं...


"ठीक से भर बेटा, ठीक से।" दुलारा ने कहा, तो उसने उसमें दो-चार बूंदें और टपका दीं।

गिलास लगभग ऊपर तक भरे थे। "इसमें पानी कैसे मिलाएंग?" कार्तिक ने पूछा, तो दुलारा हंसा-"इसे ऐसे ही खींचा जाता है बाबूजी!", उसने कहा और गिलास होंठ से लगाकर एक सांस में खाली कर दिया।

हमने देखा और लोग भी ऐसा ही कर रहे थे। एक सांस में खींच कर गिलास खाली करते और हाथ से मुंह पोंछते हुए चले जाते।

हम गिलास मुंह तक लाए तो एक विचित्र-सा भभका नथुनों में भर गया। "ऐसे तो न पी जाएगी", मैंने और कार्तिक ने लगभग एक साथ कहा।

दुलारा फिर हंसा, "अच्छा आइए, इधर बैठ जाइए।" उसने कहा और हमें छप्पर के नीचे बैठे उस आदमी के पास ले आया। तख्त पर हमें बिठाते हुए वह उससे बोला, "बाबू लोगों से खींची ही नहीं जा रही।" और फिर हंसने लगा।

हमने एक चूंट किसी तरह गले के नीचे उतारा।

"ऐसे तो न चलेगी। कुछ खाने को न मिलेगा यहां?" कार्तिक ने कहा।

"खाने को यहां क्या मिलेगा?" दुलारा ने कहा, फिर जेब में हाथ डालते हुए बोला, "लीजिए, मूंगफली पड़ी हैं कुछ। इसके साथ पीजिए।"

हमने सिगरेट सुलगाई और धीरे-धीरे पीने लगे।

"जल्दी कीजिए, गिलास ज्यादा नहीं हैं।" उस व्यक्ति ने हमें टोका।

दुलारा ने उसे समझाया, "हमारे दफ्तर के अफसर लोग हैं। पहली बार पी रहे हैं। तुम फिकर न करो, गिलास कम न पड़ेंगे।"

इस बीच ग्राहक आते जा रहे थे। हमें लगा, वाकई गिलासों की दिक्कत पड़ रही है। अतः हमने किसी तरह बची हुई शराब गले के नीचे उतारी और उठकर खड़े हो गए।

"चलो, चला जाए।" मैंने कार्तिक से कहा।

"अरे एक गिलास में क्या होगा", दुलारा बोला, "एक-एक गिलास तो और
लीजिए। यह कालीचरन का अड्डा है।" उसने उस व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा, “सबसे बढ़िया शराब मिलती है यहां, सारे गंगा पार में। और सब तो साले नौसादार मिलाते हैं।"

अब नौसादर की मनुष्य के रक्त में मिलने से क्या प्रतिक्रिया होती है, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन मुझे डर लगा कि कहीं यह भी नौसादर न मिलाता हो, अतः मैंने कहा, "मैं अब नहीं लूंगा।"

मगर कार्तिक संतुष्ट नहीं था। “लोगे क्यों नहीं?" उसने कहा और दुलारा' से तीन गिलास और लाने को बोल दिया। "बल्कि एक गिलास और लाओ इनके लिए भी।" उसने कालीचरन के लिए कहा।

मगर कालीचरन ने मना कर दिया। "नहीं-नहीं, आप लोग लीजिए।" उसने कहा।
"अरे लो न भई, हमारी तरफ से है यह।" मैंने भी कहा। मन में सोचा, अगर यह लेगा, तभी मैं भी लूंगा।

कालीचरन मान नहीं रहा था। मगर बाद में दुलारा उसके लिए भी ले आया, तो उसने गिलास हाथ में ले लिया और एक ही सांस में उसे खाली कर दिया। दुलारा ने भी ऐसा ही किया। परंतु हम लोग आराम से पीते रहे। कालीचरन ने इस बार देर लगने पर कोई आपत्ति नहीं की। हमने उसे सिगरेट भी पिलाई एक।

दूसरे गिलास के बाद तो हम खासे मूड में आ गए। कार्तिक के कहने पर हम लोगों ने आधा-आधा गिलास और ली।

चलते समय कार्तिक ने एक रुपया अलग से उन बच्चों को दिया।

"बहुत बढ़िया हैं साहब लोग", हम चलने लगे, तो दुलारा ने कालीचरन से कहा, "पहचान लो। आगे से आएं, तो कोई तकलीफ न हो इन्हें।"

कालीचरन उठकर खड़ा हो गया। कार्तिक ने बाकायदा उससे हाथ मिलाया और हम उसी रास्ते से लौट आए, जिस रास्ते से गए थे।

इसके बाद तो अमरूद की वह बगिया एक तरह से हमारा स्थायी अड्डा ही बन गया। अकसर ही शाम को हम उधर निकल जाते। साथ में चना, चूड़ा, दालमोठ या मूंगफली जैसी कोई चीज लेते जाते ओर विशुद्ध मध्यवर्गीय अंदाज में पाल्थी मार कर तख्त पर बैठकर कालीचरन से बतियाते हुए उस बेहद हीक मारने वाली शराब की चुस्कियां लेते रहते। हीक के बावजूद थी वह जोरदार । टिंचर-जिंजर या सुरा की तुलना में तो निश्चित ही बेहतर थी। और सस्ती भी।

कार्तिक में एक गुण है। वह जिस किसी के भी संपर्क में आता है, जल्दी ही उससे ऐसी घनिष्ठता बना लेता है, जैसे सात पुश्तों से दोनों के दादा-परदादा एक ही थाली में खाते आए हों। यही कालीचरन के साथ भी हुआ। यहां तक कि कालीचरन अब हमें देखते ही तख्त झाड़ने-पोंछने तो लगता ही-इस बीच उसने, शायद हमारे लिए ही, एक फटी-पुरानी दरी की भी व्यवस्था कर ली थी-बल्कि प्रायः ही हमसे पैसे लेने में भी संकोच करने लगा। लेकिन कार्तिक उसे इस कहावत का हवाला देकर कि घोड़ा घास ये यारी करेगा, तो खाएगा क्या, बराबर पैसा देता रहा। छुट्टीयों में तो कभी-कभी हम दिन में ही वहां निकल जाते और बाकायदा पिकनिक जैसी मनाते। अमरूद की उसी बगिया में मिट्टी की हांडी में मीट बनता, सूखी लकड़ियों को जलाकर उन पर रोटियां सेंकी जाती, या फिर मछलियां भुनतीं और केले या पपीते के पत्तों पर परोस कर भोजन किया जाता। एक बार शिकार का भी प्रोग्राम बना। कार्तिक अपने बैंक के सिक्योरिटी ऑफिसर को, जिसके पास एयरगन थी और जो इस नौकरी में आने से पहले आर्मी में कैप्टन होने और पाकिस्तान से भारत की दूसरी लड़ाई में भाग लेने का दावा करता था, बुला लाया। पाकिस्तान से लड़ाई के दौरान उसने क्या जौहर दिखाए थे, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन उस दिन उसने जरूर कोई तीन घंटे बरबाद करने के बाद चार फाख्ता मारे, जिन्हें छील-छाल कर वहीं बगिया में मिट्टी की हांडी में पकाया गया और कच्ची शराब के साथ पेट में उतार दिया गया।

तभी एक दिन कालीचरन के बहुत कहने पर, या शायद कार्तिक की इच्छा से कालीचरन के घर पर प्रोग्राम बना। बगिया से थोड़ी दूर पर ही गंगा की रेती के निकट कुछ ऊंचाई पर उसका झोपड़ीनुमा मकान था। सामने कुछ खाली जमीन थी, जिसमें पपीते के दो-एक पेड़ लगे थे और बेशरम की झाड़ियां उगी हुई थीं। वहीं चारपाई डालकर कालीचरन ने हमें बिठाया। एल्यूमीनियम की तश्तरी में मीट परोसा। हां, शराब जरूर शीशे के गिलासों में पिलाई और शराब के पैसे भी, बावजूद हमारे जोर देने के, नहीं लिए।

उस दिन कालीचरन के बारे में हमें विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई। यह भी हमें पहली बार पता चला कि अमरूद की बगिया में जो बच्चे सुबह सात-आठ से रात के दस बजे तक रबर के ब्लाडर से शराब बेचते थे वे कालीचरन के ही बच्चे थे। अभी तक इसकी जानकारी हमें न होने का मात्र एक ही कारण, जो मैं समझ सकता हं, शायद यह था कि हम अपने मन में यह मान बैठे थे कि कालीचरन उन्हें कुछ रुपये देकर यह धंधा करवा रहा है। कालीचरन की पत्नी को भी उस दिन हमने पहली बार देखा। वैसे वह हमारे सामने आ नहीं रही थी। कालीचरन या फिर उसके बच्चे ही बार-बार झोंपड़ी में जाकर जो कुछ लाना होता, ला रहे थे। लेकिन कार्तिक ने उसकी पत्नी को एक तरह से जबरदस्ती या फिर नशे के झोंक में यह कहने के लिए बलवाया कि मीट बहुत अच्छा बना है। बात तो वैसे जबान से कही और कान से सुनी जाती है, लेकिन शायद यह प्रक्रिया तब तक पूरी नहीं होती, जब तक कहने-सुनने वाले एक-दूसरे का मुंह न देख लें। अतः कार्तिक ने जिद करके कालीचरन की पत्नी को बुलवाया ही नहीं, उसका चूंघट भी उतरवा दिया, जिसे उसने काफी संकोच के बाद ही हटाया।

घूँघट दो काम करता है। जहां वह एक हसीन सूरत को किसी की बुरी नजर से बचाता है, वहीं कुरूपता को दूसरों की नजर से छिपाता भी है। कालीचरन की पत्नी के साथ दूसरी बात लागू होती थी। वह खासी कुरूप औरत थी। मैंने और शायद कार्तिक ने भी पहली बार इतनी कुरूप महिला देखी थी। रंग तो उसका काला था ही, चेहरे की बनावट भी कुछ अजीब थी। ऐसा लगता था, जैसे हड्डियों के ढांचे पर खाल चढ़ा दी गई हो। लेकिन इस देश में तो, जहां निन्यान्वे प्रतिशत विवाह परिवारों के बीच तय होकर होते हैं, औरत महज घर बसाने के लिए होती है। और इस औरत के होते कालीचरन का घर भी बस गया था।

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