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कामतानाथ संकलित कहानियां

कामतानाथ

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6427
आईएसबीएन :978-81-237-5247

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आम जनजीवन से उठाई गई ये कहानियां कथाकार के रचना-कौशल की वजह से ग्रहण के स्तर पर एक तरफ बतरस का मजा देती हैं तो दूसरी तरफ प्रभाव के स्तर पर उद्वेलित करती हैं...


वैसे इस घर बसने के पीछे भी एक कथा थी। कालीचरन की पत्नी उत्तर भारत की न होकर दक्षिण भारत के किसी गांव की थी और उन भाग्यहीन संतानों में से थी, जिनके माता-पिता संतान के जन्म के दो-एक वर्ष बाद ही स्वर्ग सिधार जाते हैं और संतान को पालने-पोसने का भार किसी निकट संबंधी पर छोड़ जाते हैं। कालीचरन की पत्नी के केस में यह भार उसके मामा-मामी पर पड़ा था। उन्होंने उसे पाला भी। लेकिन जिंदगी भर तो कोई लड़की, इस देश में सगे-संबंधियों की बात छोड़ दीजिए, अपने मां-बाप के घर में भी नहीं पल सकती। एक उम्र के बाद उसे पालने की जिम्मेदारी कुछ धन-संपत्ति के साथ किसी दूसरे को सौंप दी जाती है। कुछ लड़कियां जरूर ऐसी होती हैं, जो स्वयं ही, कभी-कभी बल्कि प्रायः ही मां-बाप की मर्जी के खिलाफ किसी को समर्पित हो जाती हैं, लेकिन इस समर्पण के लिए यदि जिसके प्रति समर्पित हआ जाता है निरा मूर्ख ही न हो तो, लड़की में कुछ विशेष गुणों की आवश्यकता होती है, चाहे वे मानसिक हों या शारीरिक। और कालीचरन की पत्नी में ऐसे कोई गुण नहीं थे। अतः समर्पण की यह रस्म निभाने के लिए उसके मामा-मामी ने एक युक्ति निकाली। वह यह कि कार्तिक पूर्णिमा जैसे किसी शुभ अवसर पर वह उसे लेकर कानपुर गंगा स्नान करने आए और वहीं गंगा किनारे नहा-धोकर, उसे नहला कर, जो भी संकल्प मन में लिया हो, उसके साथ, उसे बिना कुछ कहे-सुने वहीं भीड़ में अकेला छोड़कर वापस अपने गांव चले गए।

दिन-भर उन्हें भीड़ में खोजने और लीटर-डेढ़ लीटर आंसू बहाने के बाद कालीचरन उसे मिल गया था और चूंकि कालीचरन भी दुनिया में अकेला था, यहां तक कि अपने मां-बाप का नाम भी उसे नहीं पता था और जब से होश संभाला था, तब से अपने-आपको गंगा पर बने रेल के पुल के नीचे यात्रियों द्वारा जल में फेंके गए पैसों की तलाश में पानी में गोते लगाते पाया था, अतः दोनों एक-दूसरे के साथ रहने लगे थे। वैसे इस तरह की घटनाओं से, चाहे वे किसी भी वर्ग में घटें, इस देश में काफी बवंडर होने की संभावना रहती है। लेकिन चूंकि कालीचरन की पत्नी-अब देखिए मैं बार-बार उसे पत्नी कह रहा हूं, हालांकि बाकायदा विवाह न होने की स्थिति में उसे कानूनी तौर कर पत्नी शायद नहीं कहा जा सकता, लेकिन अब जब उससे कालीचरन के दो संतानों भी हो चुकी थीं, तो और कहा भी क्या जाए! बहरहाल, चूंकि कालीचरन की पत्नी हद दर्जे तक कुरूप थी, अतः किसी भी तरह का कोई बवंडर नहीं हुआ और कालीचरन, जिसके रहने-खाने का अभी तक कोई ठिकाना नहीं था, एक झोपड़ी बना कर बाकायदा उसके साथ रहने लगा। अब चूंकि कालीचरन अकेला नहीं रह गया था, यानी एक ही जगह दो पेट भरने की व्यवस्था उसे करनी थी, इसलिए उसने इस बीच कई धंधे किए। गंगाघाट स्टेशन पर रुकने वाली रेलगाड़ियों और रेलवे क्रासिंग बंद होने पर दोनों ओर रुक जाने वाली यात्री बसों पर ककड़ी, जामुन, तरबूज, अमरूद या फिर केवल पानी बेचने से लेकर रिक्शा चलाने या फिर मछली पकड़ने-बेचने और मेले-ठेले के दिनों में किराए की नाव पर यात्रियों को इस पार से उस पार ले जाने और रिक्शे के मालिक से एक बार झगड़ा-टंटा हो जाने के कारण पुलिस की जद में आने के पश्चात पुलिस की मुखबरी करने तक अनेक धंधे वह अपना चुका था। और अब यह कच्ची शराब का धंधा चल रहा था।

हमारा ख्याल था कि इस धंधे मे उसे खासी आमदनी थी, लेकिन उस दिन हमें पता चला कि इस धंधे से बस उसकी रोटी ही किसी तरह चल रही थी। आमदनी यदि किसी की ही रही थी, तो वह थी पुलिसवालों की, क्योंकि पूरे पांच सौ रुपये हफ्ता उसे उस क्षेत्र के थानेदार को पहुंचाना पड़ता था। उस पर भी कभी-कभार एक्साइज वाले छापा मार देते थे और पकड़े जाने पर उन्हें भी कुछ पूजना पड़ता था। यही कारण था कि वह स्वयं शराब न बेच कर अपने बच्चों से बिकवाता था, क्योंकि बच्चों के पकड़े जाने पर एक्साइज के सिपाही उनके पास जो रकम होती, उसे छीन-छान ब्लाडर में बची शराब वहीं जमीन में फेंक, चार-छह झापड़ रसीद कर, उन्हें दोबारा वहां न दिखाई देने की ताकीद कर चले जाते।

उस दिन कालीचरन के घर पर उससे यह सारी कथा सुनने के बाद कार्तिक के मन के किसी कोने में छिपा हुआ समाज-सुधारक जाग उठा। इसके पीछे मूल कारण यह तो था ही कि समाज-सुधार के कुछ जरासीम उसके रक्त में शुरू से ही थे, दूसरा कारण यह भी था कि पुलिस की जरा भी ज्यादती देख या सुन कर उसका खून उबाल खाने लगता था। और चूंकि शराब खून के इस उबाल में कैटालेटिक एजेंट का काम करती है, इसलिए उसके खून ने शरीर में शराब की एक निश्चित मात्रा जाने के बाद, कुछ ज्यादा ही उबाल खाया और उसने कालीचरन से कहा कि वह दरोगा को रुपये देना बंद कर दे, जो होगा वह देख लेगा। या तो कालीचरन। ने इतनी शराब नहीं पी थी, या फिर उसकी व्यवहारिक बुद्धि कार्तिक की बुद्धि की अपेक्षा कुछ अधिक थी, अतः उसने कार्तिक की इस बात पर हंसने के अतिरिक्त कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की।


कार्तिक को भी जल्द ही अपनी बात के अव्यवहारिक होने का एहसास हो गया, अतः उसने कालीचरन को दूसरी राय दी कि वह यह धंधा छोड़कर कोई दूसरा सम्मानजनक धंधा शुरू करे। कालीचरन इस बात के लिए राजी था। लेकिन समस्या धंधा चुनने और उस पर आने वाली लागत के लिए धन जुटाने की थी। अंततः कई दिनों तक दिमाग खपच्ची करने के बाद हम सबने मिलकर तय किया कि कालीचरन गंगघाट स्टेशन और रेलवे पुल के बीच जाने वाली सड़क पर पान की दुकान खोले और यदि संभव हो, तो वहीं दुकान की बगल में भट्ठी जमा कर चाय का धंधा भी शुरू करे। चूंकि वहां से खासा ट्रैफिक गुजरता था, अतः हमें उम्मीद थी कि तीस-चालीस रुपये रोज की आमदनी तो धीरे-धीरे होने ही लगेगी। इसके लिए कम-से-कम तीन हजार रुपयों की आवश्यकता थी, जिसके लिए कार्तिक ने घोषणा की कि वह इतनी रकम कालीचरन को अपने बैंक से कर्ज दिलवा देगा।

अब समस्या थी जगह की। खुश किस्मती रही कि उसका हल भी निकल आया। स्टेशन की तरफ वाली सड़क के किनारे की जमीन रेलवे की थी और संयोग से गंगाघाट स्टेशन का स्टेशन मास्टर कार्तिक का बचपन का एक दोस्त निकल आया। उसने कार्तिक से वहां दुकान लगाने के प्रति अपनी आंखें बंद करने का वायदा कर लिया। इसका एक कारण यह भी था कि उसकी वहां पोस्टिंग के पहले से ही रेलवे की जमीन पर कुछ लोगों ने अनधिकृत ढंग से कब्जा जमा रखा था।

इस प्रकार सारी योजना तय हो जाने के बाद कार्तिक कालीचरन को अपने बैंक ले गया और आवश्यक लिखा-पढ़ी के बाद उसे तीन हजार रुपये कर्ज दिला दिया। जमानत मैंने दी। दुकान बनने का आर्डर हमने पहले से ही दे रखा था। अगले ही दिन दुकान ठेले पर लदवा कर हम उसे यथास्थान ले आए। धुकान से संबंधित अन्य सामान भी, जिसमें ग्राहकों के पान खाने के बाद उसके होंटों पर रचने की प्रक्रिया को देख सकने की सुविधा के लिए एक बड़ा-सा शीशा भी था, ले आए और कालीचरन ने किसी पंडित से काशी में छपे हुए किसी पत्रे की सहायता से शुभ मुहूर्त निकलवा कर एक दिन अपने घर में सत्यनारायण की कथा करवाई तथा उसी दिन शाम उसी पंडित से दुकान का उद्घाटन करा दिया। दुकान के पहले ग्राहक हम और हमारे स्टेशन मास्टर मित्र बने। एक बीड़ा पंडित जी ने भी खाया, लेकिन उसके पैसे उन्होंने नहीं दिए।

दो-चार दिन में ही दुकान खासी चल निकली और जल्द ही कालीचरन ने चाय के लिए भट्ठी भी बिठा ली। कुछ नमकीन और बिस्कुट भी वह रखने लगा। अब भी हम अक्सर शाम को उधर ही निकल जाते। कालीचरन अभी भी हमारे लिए कहीं-न-कहीं से कच्ची शराब का प्रबंध कर देता, क्योंकि उसके अलावा भी वहां उसके कई अड्डे थे। हां, अब हम, लोगों की आंख बचा कर, उसकी दुकान पर ही पी लेते, या फिर कभी-कभी स्टेशन मास्टर की तरफ निकल जाते और उसके कमरे
को पवित्र करते।

कार्तिक का सुधारवाद कालीचरन की दुकान खुलने तक ही सीमित नहीं रहा। वह और आगे बढ़ा और अब उसने कालीचरन को अपने बच्चों को स्कूल में भरती कराने की राय दी। इस सुझाव से कालीचरन को तो कुछ कम, लेकिन उसकी पत्नी को कुछ अधिक प्रसन्नता हुई। अंततः एक दिन कार्तिक स्वयं उसके बच्चों को ले जाकर एक स्कूल में भरती करा आया। कालीचरन की दुकान की आमदनी से ही उनकी फीस भरी गई, पुस्तकें आदि आईं और स्कूल की ड्रेस भी बनी। दोनों बच्चे समय से स्कूल जाने लगे।

तभी एक दिन शाम को उधर गए तो कालीचरन ने हमें बताया कि थाने के दरोगा ने उसे बुलाया था तथा हफ्ते की मांग की थी। कालीचरन ने उससे कहा कि उसने धंधा ही बंद कर दिया है तो उसने उसे एक मोटी-सी गाली दी, जिसे इस कागज पर नहीं लिखा जा सकता और बोला, "तो अब शरीफ आदमी बन गए? यह दुकान खोलने के लिए पैसे कहां से आए? किसके यहां सेंध मारी है?"

कालीचरन ने बैंक से कर्ज लेने की बात कही तो उसने पहले से ज्यादा डबल गाली दी और उस पर आरोप लगाया कि वह अब दुकान की आड़ में धंधा कर रहा है। "मुझे सब मालूम है बेटा", उसने कहा, "जैसे थे वैसे रहो, नहीं तो अच्छी तरह से दुरुस्त कर दूंगा।" (दुरुस्त तो मुझे मजबूरी में लिखना पड़ रहा है, कहा तो उसने कुछ और ही था)।

कार्तिक ने यह सुना, तो उसके खून ने फिर उबाल मारा और वह तुरंत दारोगा से बात करने जाने के लिए तैयार हो गया, लेकिन मैंने और मुझसे कुछ ज्यादा स्टेशन मास्टर ने उसे ऐसा करने से मना किया। गनीमत थी कि वह मान गया। हां, यह हम लोगों ने जरूर किया कि उस दिन से कालीचरन की दुकान पर पीना बंद कर दिया। अब हम फिर सुरा पर उतर आए, या फिर कभी-कभार कहीं से हिस्की या रम की कोई बोतल मिल जाती, तो बाकायदा नहा-धोकर उसे इस तरह ग्रहण करते, जैसे हजारों मील दूर से किसी तीर्थस्थल का प्रसाद किसी ने हमें लाकर दिया हो। कालीचरन की तरफ जाना भी हमारा कुछ कम हो गया।

तभी एक दिन मैं ऑफिस में बैठा काम कर रहा था कि चपरासी ने आ कर मुझसे कहा कि काई औरत चूंघट काढ़े बाहर खड़ी मुझे पूछ रही है मैंने बाहर आकर देखा तो कालीचरन की बीवी थी। मुझे देखते ही वह रोने लगी। किसी तरह हिचकियों के बीच उसने मुझे बताया कि दोपहर पुलिसवालों ने आकर कालीचरन की दुकान का सारा सामान इधर-उधर फेंक दिया और उसे पकड़ कर अपने साथ ले गए। मैंने तुरन्त कार्तिक को फोन किया तो उसने मुझसे कहा "उससे कहो कि वह घर जाए मैं आ रहा हूं।" मैंने ऐसा ही किया।

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