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जीवनी/आत्मकथा >> बसेरे से दूर बसेरे से दूरहरिवंशराय बच्चन
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आत्म-चित्रण का तीसरा खंड, ‘बसेरे से दूर’। बच्चन की यह कृति आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है और इसकी गणना कालजयी रचनाओं में की जाती है।
पृष्ठ संख्या-87
दोस्तों के सदमे-1
आई वाज ऐंग्री विद माई फ्रेंड :/ आई टोल्ड माई राथ, माई राथ डिड एण्ड' ब्लेक।
काश कि तुम यह जान सकते/ कि जिन्हें तुम समझते आये हो अपना दोस्त, / अपना मेहरबान, अपना शुभचिन्तक, / वे अपने दिल की गहराइयों में / तुमसे करते हैं कितनी नफरत, / करना चाहते हैं तुम्हारा कितना नुकसान!
अजीब होता है इन्सान! / करता है दोस्त की तलाश, / और जब तक दोस्त हो दुखी, दोस्त पर हो मुसीबत, / इसको आता है मज़ा, / दिखाने में हमदर्दी। पर जो वह फूले-फले, और हो खुश, / तो इसके सीने पर लोट जाता है साँप, / क्योंकि उसे नहीं रहती इसकी हमदर्दी की ज़रूरत।
लोग कहते हैं मुसीबत में नहीं मिलता दोस्त। / मैं कहता हूँ, बात है गलत। / मुसीबत में ही मिलते हैं दोस्त। और अगर हो मुसीबत के पार, / खुश व खुर्रम व दिलशाद, / तो मेरी बात रखना याद, / तुम्हारे दुश्मन होंगे हज़ार।
जो तुम्हारे दुःख में दिखाते हैं संवेदना, सहानुभूति, / उनसे रहना होशियार; / वे हैं मक्कार; / जो तुम्हारी हँसी-खुशी में हैं साथ,/ वे हैं दिल के साफ;/ वे तुम्हें करते हैं प्यार; / वे साबित होंगे वफादार। / बात लगती हो नाकबिले एतबार, / पर तजुरबा भी तो कोई चीज़ है, मेरे यार! / जो बहाते थे मेरे साथ आँसू, / लिये फिरते हैं मेरे लिए कटार ; / जो पीते थे मेरे साथ शराब, / वे अब भी मेरे दोस्त, मेरे अहबाब। आप हैं एक मिसाल! -/ नक्काल कहीं के-नक्काल!-/ जब मैं हलाहल के चूंट पी रहा था, / यह इतना रोया, / मुझे लगा, / किसी ने अमृत से मेरा मुँह धोया। / अब जो मैंने ली है आराम की एक साँस, / इसके घर में पड़ गया है मातम। / ऐसों के ही लिए कह गये हैं तुलसीदास-/ कि ये दूसरों की हानि में / समझते हैं अपना लाभ, / दूसरों के उजड़ने पर होते हैं हर्षित, / बसत पर मनाते हैं विषाद, / कि ये हैं नकारे, काहिल, कामचोर, / पर करना हो किसी का अकाज, / तो लेंगे सहस्रबाहु से होड़,/ अपना तन भी देंगे छोड़, / गल जायेंगे, जैसे पत्थर, / पर खेती कर देंगे बर्बाद। / किसी का बेकाम होता हो घी / तो ये पड़ जायेंगे बनकर मक्खी। क्या हैं ये, / अगर नहीं मक्खी के ही समान? / पर ये हैं जितने छोटे, / उतने ही खोटे। / देखने को दसरों का दोष. / इनके हैं हज़ार आँखें:/करने को दसरों की बुराई, / इनके हैं हज़ार ज़बानें-/ शेषनाग के हैं बड़े भाई-/ सुनने को दूसरों का पाप, / इनके हैं दस हज़ार कान। / कीचड़ से लड़ने के लिए , / ज़रूरी है कीचड़ में प्रवेश; / बुरे को परास्त करने के लिए, / आवश्यक है बुराई का हथियार; / बुराई की भूषा, बुराई का वेश, / भगवान् को लेना पड़ा था सुअर का अवतार। / ये तो अपने आप में ही / लिये हैं मौत का बीज, / ये हैं क्या चीज़! / इनसे बचना समझकर बेकार, / तुलसी ने किया था इन्हें दूर ही से नमस्कार। छिपता नहीं नीच, लाख करे प्रयास, / मुझे भी मिल गया था इसका आभास; / पर मेरा तो था और ही विश्वास, / मैंने जीवन किया था स्वीकार-/रंग, रस और पराग; पंकज और पानी;/ भौंरा और दादुर; / काई और कीच और सेवार;-/ तब भी मेरी कच्ची जवानी।। सुन्दर और असुन्दर जग में / दोनों को सराहा था-/ हंस की सहलाई थी गर्दन, / कौए को भी चाहा था; / उसे भी दिया था अनुराग-/ मौके न करूँगा बयान, / ओछी बात; / बड़ों की सीख, / नेकी कर, कुएँ में डाल,/ बायस को भी दिया था मैंने अनुराग, / परन्तु निरामिष हुआ है कभी काग?
यह तो निकला और बड़ा घाघ, / नोचता है मेरा ही मांस!-/देख अपनी चोंच की ओर, / मना उसकी खैर, / ओ, नादान, / मेरा हृदय भर ही कोमल, / बाकी जगह मैं हूँ वन-कठोर; / विद्यापति की प्रेयसी के बिल्कुल विपरीत, / जिसका कुसुम का था मकल शरीर, / हृदय था पाषाण! / ओ मेरी मुसीबत के दिखावटी दोस्त,। मेरे कानों में आयी है आवाज़, / कि मेरे बारे में बनाकर अजीबोगरीब कहानियाँ। तुम जगह-जगह करते हो प्रचार। / क्यों खराब करते हो अपना वक्त ?/ मैं हूँ अकिंचन, अपदार्थ, न-कुछ, / क्यों मुझे देते हो इतना महत्त्व? / किसी बड़े को बनाओ अपना शिकार।/ कल्पना के हो भण्डार,/ तो करो कुछ सृजनात्मक,/रचो उपन्यास, नाटक, / जाने, माने तुम्हें संसार।। मेरे बारे में कहके ओछी-खोटी / तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगे? / कर दे बन्द, / जो मुझे देता रहा है समाज; / चाटकर 'तलवे,/ हिलाकर पूँछ, / मैंने नहीं कमाई अपनी रोटी। / रानी रूठेंगी, लेंगी अपना सुहाग; / राजा रूठेंगे, लेंगे अपना राज। / मेरा कलम रहे बरकरार।
छोड़े हैं जो तुमने साबुन के बुलबुले, / वे हवा में कब तक करेंगे सफर, / किनकिन पर होगा उनका असर? / छिप-छिप के जो की जाती है बात, / एक की बचा के आँख, / दूसरे का बचा के कान, / उसमें भी होती है जान? | उसे जो भी माने;/ उसका भी जो करें यकीन,। उन रबर के पुतलों को / मेरी ठोकरें-एक-दो-तीन! कवि भी छोड़ते हैं कल्पना के गुब्बारे, / पहाड़ों पर से होता है उनका एलान, / खेलते हैं उनसे आँधी-तूफान, / बिजली और बादल देते हैं उनका साथ,/ तारे करते हैं उनसे बात, / उल्का होते हैं उनके पास, / आसमान करता है उनका सम्मान, / ज़मीन के होते हैं वे मेहमान, / और उन्हें छूकर / इन्सान उठ जाता है ऊपर। इन गुब्बारों में भरने को / नहीं चाहिए साँस, / दमे के बीमार की, / उखड़ी हुई, टी/ अब छूटी कि तब छूटी ! / इनमें भरने को चाहिए / कवि के वक्षस्थल की साँस / लिए हए आत्मविश्वास, / जो खिंचती है तो / खींच लेती है प्राण./निकलती है तो। करती है अमरत्व प्रदान!
जो हैं खुद मुर्दे / किसी को नहीं दे सकते जीवन-दान, / चाहते हो कि जिएँ तुम्हारे आख्यान? | तो जाओ, करो साधना, / जब लौटकर आओगे, / बहुत कुछ बदल जाओगे,/ ज़िन्दगी की शक्ल और ही कुछ पाओगे।
पर अगर / साधना से डर लगता है, / तो सुनो, ओ नक्काल, / दो-चार कान के कच्चों में / घूम-फिरकर बयान-/ हो जायेगा बेजान। / चेहरा लगाकर फिरोगे कब तक? / दुनिया एक न एक दिन तुम्हें पहचानेगी।/ बहुत दिन पूजता नहीं वेश का प्रताप, / अन्त में परदा उघरता है अपने आप, / झूठ की खुलती है कलई, / साँच को नहीं आती आँच। / इसी एक एतकाद पर / मैंने किया है जीवन भर संघर्ष। सहा है मान-अपमान, / चलाई है लेखनी, / खोला-मूंदा है मँह.। टोला है अवसाद-अपवाद;/ जिस दिन झूठे, चोर, चालबाज़, / चापलस और चगलखोर। बन जायेंगे कोई ताकत, / कोई प्रभाव, / निश्चित करेंगे तुम्हारा-मेरा / उतार-चढ़ाव, उसी दिन / विधाता के मुँह पर थूक, / दुनिया को लगा के दो लात / कर लंगा में आत्मघात।
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