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जीवनी/आत्मकथा >> बसेरे से दूर बसेरे से दूरहरिवंशराय बच्चन
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आत्म-चित्रण का तीसरा खंड, ‘बसेरे से दूर’। बच्चन की यह कृति आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है और इसकी गणना कालजयी रचनाओं में की जाती है।
पृष्ठ संख्या-85
...का जन्मदिन
मेरे जीवन का, / एक ताजे सपने-सी है उसकी याद, / ऐसा भी था काल, / जब साल-दर साल, / समय की सीढ़ियों पर चढ़ना था खेल, / था उन्माद। / बचपन और यौवन दोनों बीत चुके हैं, / दोनों पर जीत, / पा चुका है अतीत।
माता के घुटने, / पिता की कमर, / माता के कन्धे, / पिता का सर- / थे मेरे बढ़ने की माप;/ मेरे चढ़ने की चाल / थी कितनी तेज़,/ साल-दर-साल। मैं उठ रहा था ऊपर, / और मेरे साथ-ही-साथ, / चौड़ी होती जाती थी ज़मीन, / फैलता जाता था आसमान।
अब तो, / कभी की रुक चुकी है मेरी उठान, / बढ़ती नहीं ज़मीन, / बढ़ता नहीं आसमान, / अब वे केवल बदलते रंग। / बहुत दिन यह सब देख, / मैं रहा दंग,। पर जब से पढ़ी पोथियाँ, / किया विद्वानों का संग,/ समझ में आ गयी यह बात-/ यही है दुनिया का ढंग।
पर, प्यारे भाई, / आज है तुम्हारा जन्मदिन। / सोचा था मैंने, / लिखूगा कुछ पंक्तियाँ। दूंगा बधाई, / पर मैं कर रहा हूँ क्या! / कवियों की कौम, / होती है बड़ी बदज़ात। करें ये चाँद-किरन परियों का गान, / और अगर हों प्रगतिशील, / करें रूस और चीन का बखान, / पर ये घूम-फिरकर, / करते हैं अपनी ही बात।/ कवियों की कौम होती है बड़ी बदज़ाज।
तो तुम हुए आज छब्बीस;/ आ गया याद मुझे सन तैंतीस, / तब मेरी थी यही उमर,/ जब मस्ती से उभर, / गाया था मैंने मधुशाला का गीत, / मेरी वाणी को लग गये थे पर, / धरती पर पड़ते नहीं थे मेरे पाँव / चर्चा थी मेरी ठाँव-ठाँव।। और मैं कल्पना के पँखों पर आसीन, / उड़ा जा रहा था वहाँ,। जहाँ एक और दो, / होते नहीं तीन। पलों को नापती हैं शताब्दियों की माल, / बूंदों पर होते हैं निसार, / पारावार के पारावार, / और आँसुओं का भार / सिद्ध कर देता है हलका / सारे सितारों का संसार। / कमाल!
पर आज / भारी है मुझ पर दिन, / भारी है मुझ पर रात;/ पर छोड़ो भी मेरी बात।। तुम्हारी है छब्बीसर्वी वर्षगाँठ, / गैस के छब्बीस रंगीन गुब्बारे, / तुम्हारी आयु के साल ; / उन्हीं के सहारे / देखता हूँ तुम्हें ऊपर आते, / खुशियाँ मनाते, / शामिल हूँ मैं तुम्हारे साथ। / जानते हो मेरा इतिहास, / इसी से नहीं विश्वास? / जिनकी आँखों में हैं आँसू, / वही समझते हैं फूलों का हास, / जिनके सीने पर है चट्टान, / वही समझते हैं तितलियों की उड़ान, / कलियों की मुसकान।
कवि / होता है नबी, / नबी उपदेश देने से नहीं चूकता, / पड़ जाती है बान, / अन्त में थोड़ा-सा व्याख्यान। / जीवन सब दिन नहीं रहता खेल, / नहीं तो, प्रकट करता यह चाह-/ हँसते-हँसाते, / उछलते-कूदते, शोर मचाते, / चले जाओ जगती की राह, / लूटते वाह-वाह। / जीवन एक दिन बनता है भार, / क्योंकि प्रकृति करती है मनुष्य का सम्मान, / नियति करती है मनुष्य का सत्कार ; / अधिकारी का ही होता है इम्तहान। / शोर मचाते, / उछलते-कूदते, / हँसते-हँसाते / अच्छे लगते हैं। भोले, सुकुमार अनजान बच्चे, / बड़े लगते हैं मक्कार भाँड़। / मैंने भी देखी है ज़िन्दगी, दुनिया भी ली देख; / जहाँ भी मैंने पाया कोई / काया नवाने के योग्य। उसके मुख पर थी चिन्ता, / मस्तक पर थी रेख, / और देखा भी है मैंने इन्सान। उतना ही भारी था उसके कान्धों पर बोझ,/ जो था जितना ही महान।
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