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जीवनी/आत्मकथा >> बसेरे से दूर

बसेरे से दूर

हरिवंशराय बच्चन

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :236
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 665
आईएसबीएन :9788170282853

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आत्म-चित्रण का तीसरा खंड, ‘बसेरे से दूर’। बच्चन की यह कृति आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है और इसकी गणना कालजयी रचनाओं में की जाती है।


पृष्ठ संख्या-81

कड़ुआ अनुभव

क्या तुझ पर गुज़ारा है ऐसा वक्त, / जब सारा जहान, / लगता है एक मसान, / और मरे, मिटे, जले, बुझे सपनों की राख का भार, / लगता है ऐसा भारी, / जैसे छाती पर रख दिया गया हो पहाड़, / सपने लेते हैं साँस, / सपनों के होता है शरीर,। उन्हें भी लगता है मौत का तीर, / उनसे भारी होती है उनकी लाश, / दिया है उन्हें तूने कभी काँधा? और उनकी राख, / होती है और भी वज़नदार। / वज्र को माननी पड़ती है / फूल से हार।

जब ऐसा आता है समय, / क्या करते हैं लोग? / खोजते हैं नहीं डॉक्टर, वैद्य, हकीम; / उनके बस का नहीं यह रोग; / भंग, शराब, अफीम, स्लीपिंग पिल बहला नहीं पाती दिल। / इसका एक ही इलाज, / पहले भी लोग करते थे यही, / करते हैं आज भी। / लोग ढूँढते हैं एक हमदम, / एक दोस्त, / एक साथी, / एक मीत, / और उससे कह डालते हैं, जो उन पर बीत रही है। / हल्का हो जाता है मन, / हल्का हो जाता है जीवन; / नुस्खा लगता है आसान, / पर यह है मुश्किल से भी मुश्किल।। ऐसा ही था एक वक्त, / वक्त बहुत बार मुझ पर गुज़रा है सख्त।। उसने दिलाया मुझे विश्वास, / मेरा हृदय है पारावार, / कि उसमें अगर डाल दिया जाय कैलास, / तो क्या मजाल है, / कि लहरें भी ले साँस। उपमाएँ होती हैं धोखेबाज़ / सच्चाई का लगता है नहीं अंदाज; / इन्हीं से करता रहा ज़िन्दगी भर खेल, / इन्हीं का हो गया शिकार;/ कहते आये हैं बुजुर्गवार, / डूबते हमेशा हैं तैराक! गिरा दी दीवारों पर दीवारें, / परदे पर परदे दिये फाड़,/ खोल दिये भेद पर भेद,/ फैला दिया ज़िन्दगी का नक्शा, / बोला, मेरे यार, / तुमसे कौन छिपाव, / कैसा दुराव! / उतर गया सिर का बोझ, / पलकों का भार, / निकल गया दिल का गबार।। साँस लेना था दुश्वार, / मरने का था इंतजार, / जीने में फिर से हुआ एतबार। / लगने लगी ठीक हर एक भूल, / जो थे काँटे, हो गये फूल, / और पाप? / लगा ऐसे. / जैसे हो गया हो अपने आप; / मिट गया पश्चात्ताप / जानता नहीं इन्सान-/ जो कहती है, / बरकत कितनी बड़ी है, ज़बान; / जो सुनते हैं, / कमाल कितने बड़े हैं कान; / जो समझता है, / दिल कितना बड़ा है वरदान।

जिसने सनी है तेरे दिल की बात, / उसने किया है तुझ पर एहसान, / और एहसान करने का होता है अभिमान; / जिसको भूलना नहीं आसान। / एहसान करके मौन रहता है कौन? / कोई नहीं, पर कोई एक, / जो होता है नियम का अपवाद।

एकाएक आती है एक आवाज़- / यह है मेरी भूलों का इतिहास, / मेरे शूलों का आख्यान, / मेरे भावों का उपहास, मेरे विचारों का व्यंग, / मेरी गल्तियों का फ़ब्तियाँ, / मेरी भावनाओं का मज़ाक;/ मेरे पाप मुझे जैसे रहे हैं पुकार। मेरी चोटें रही हैं जाग, / मेरा दुश्मन नहीं, मुझ पर मेरा दोस्त कर रहा है आघातं, / मेरी पीठ पीछे मुझ पर प्रहार।

ओ मनुजात, / तेरे पेट में पचती नहीं बात? / जानता नहीं इन्सान-मो कहती है। अभिशाप समान है ज़बान, / जो सुनते हैं, / अभिशाप समान हैं कान;/जहाँ बिकने को आता है। / हर भाव, विचार, समान, / अभिशाप समान है दिल की दकान। मत कर इन्सान का यकीन, / करके पछताया था आसमान, पछताई थी ज़मीन। तेरी छाती पर है भार, / तेरे दिल में तूफान-गुबार, / तेरी ज़बान को है बुखार, / तो खोज मत कान और ज़बान वाला इन्सान। / चला जा वहाँ-जहाँ हैं बियाबान / जगल सनसान, / मैदान, चट्टान। / पर्वतो से कह दे अपना पाप / पेडों को अपना सन्ताप, / फलो से कह दे अपनी भूल, / नदियों में धो डाल अपने मान। दूब पर बिछा दे अपने भाव, / और, तारों से कर ले दिल की बात. / जो बिना लिये शब्दों का आधार,/ आँखों से निकल, / गाला पर फिसल,/ गिरती है भ पर, मगर,/

पहुँच जाती है ऊपर! / धीरज की हैं ये मिसाल, / कहता जा तू इनसे अपना हाल, / ॐबेंगे नहीं ये सुनने से, / घण्टे, दिन, हफ्ते, महीने, साल-हा-साल! / ये हैं कान-ही-कान, / बिल्कुल बेज़बान, / कहेंगे नहीं किसी से तेरी बात, / कहने-कहने में बातें जाती हैं बदल, / टेढ़ी होकर, ऐंठकर हो जाती हैं बदसूरत, बदशक्ल। / पर यह सब है तेरे लिए उपदेश, / आयेगा काम, / रख याद। / मैं तो कहने को अपनी बात खोलूंगा, फिर भी इन्सान, / फिर भी आदमज़ात, / निकलें वे भले ही धोखेबाज़, / झरोखेबाज़, दगादार, करने वाले विश्वासघात। / मैं हूँ शायर,/ शायर नहीं होता कायर; / वह होता है बलवान, / जीवन के अखाड़े का पहलवान। / खुली है मेरी छाती, कमर, जाँघ, / पतलून, कमीज़ कोट की, / मुझे नहीं चाहिए ओट./खला है मेरा कसरती शरीर, /खला है मेरा दिमाग, /खला है मेरे मन का हर द्वार, / मेरी ज़िन्दगी है आम दरबार। / जहाँ आती है मुझे लाज, / वहाँ शर्मिन्दा है मानवों का सारा समाज।। और अगर तू है पूर्णता का अवतार,/ तो आ मेरे सिर पर बिराज,/ले मेरा सौ-सौ नमस्कार, / गो ऐसे दावे होते हैं निराधार। मेरे हमदम, / मेरे दोस्त, / मेरे साथी, / मेरे मीत, / तुम किसी को उठाने में असमर्थ; / गिराने में ही कमाओ नाम। / बैठा नहीं जाता बेकार; / जाओगे ऊब, / नदी में डूब, / दे न दो कहीं अपनी जान। / अच्छाई नहीं की जाती, / बुराई ही करो-खूब। / छिछले ऊपर, / खोखले भीतर, / तुम हो मेरी दया के पात्र, / अपने में क्या है जो तुम करो किसी को दान! / बहुत बड़ा कलेजा चाहिए, / किसी का करने को सम्मान, / और किसी की कमजोरियों का आदर- / यह है फरिश्तों के बूते की बात, / देवताओं का काम!

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