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जीवनी/आत्मकथा >> बसेरे से दूर बसेरे से दूरहरिवंशराय बच्चन
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आत्म-चित्रण का तीसरा खंड, ‘बसेरे से दूर’। बच्चन की यह कृति आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है और इसकी गणना कालजयी रचनाओं में की जाती है।
परिशिष्ट
मूल पाठ में जिन कविताओं का संकेत किया गया है उन्हें पाठकों की सुविधा के लिए परिशिष्ट के अन्तर्गत दिया जा रहा है।
पृष्ठ संख्या-76
रेगिस्तान का सफर
हमने माना / कि रेगिस्तान के उस पार है बहारिस्तान, / जहाँ हैं छायादार दरख्त,। रंगदार फूल, / दूर-दूर तक दूब के मैदान; / जहाँ बहती है नीले पानी की नहर, / चलती है ठण्डी हवा सर-सर-सर, / करती हुई सौरभ की बौछार, / हर मौसम में. हर वक्त; / मेहरबान है आसमान, / गूंजता है, छोटी-छोटी चिडियों का गान / मुलायम-मुलायम पत्तियों का मर्मर स्वर। / वहाँ टीले पर बैठे / चरवाहा अपनी बाँसुरी पर / छेड़ता है मनुहार-भरी तान, / चरवाहिन करती है मान,-/ प्रेम फिरफिर माँगता है प्रमाण-/ ऐसों का ही तो प्यार / रहता है सदा जवान। और भेड़ों का झुण्ड / किनारों पर बाँधकर कतार, / झुकाकर गर्दन, / बुझाता है अपनी प्यास./ होता है निहाल / देखकर अपनी परछायीं, / मिलते हैं अधर से अधर, / होता है सब पर मुहब्बत का असर।
ऐसा ख्वाब, / ताज्जुब नहीं, / जो उठाये दिल में एक लहर, एक सैलाब। मगर सोचो तो, / मेरे मीत, अनुभवहीन, / कितने दिन कितनी दूर, कितनी थकान का है सफर। / भाईबन्द, / कुटुम्ब-कबीले, / दोस्त-अहबाब-/ इनसे भी कर लो सलाह; / चार आदमी की राय से किये हुए काम का / अच्छा होता है अंजाम / वैसे, सब हैं आज़ाद / चलने को अपनी-अपनी राह।
"इस सपने की / मैंने की है खोज। / नहीं, नहीं; हो रही है गलती; / इस सपने ने। खोजा है मुझे; / मैं नहीं झुकता इसकी तरफ / यह मुझे खींच रहा है अपनी ओरः। किसमें है ज़ोर / कि मुझे रोक ले; / रोका नहीं जाता है सैलाब, / थामी कहीं जाती है लहर! / सपनों से कुछ भी नहीं है ताकतवर। / फेंक चुका है दाँव, / फेंक दिये डाँड, / दाब दी है नाव, / बाज़ी हार चुका; / मेरा सफर मुझे पुकार चुका, / दुब्धे की हालत थी कल; / आज, / यह रहा मैं-वह रही मेरी मंज़िल। / उठाने में कोई भी काम / जिगर का हौसला, जी का उत्साह, / मौजों के समान देता है उभार,। देता है उछाल, / बढ़ा भी ले जाता है कुछ दूर, / लेकिन फिर / पाँवों तले होती है धरती कठोर, / सिर पर होता है आसमान क्रूर, / हिम्मत का, दोनों ही लेते इम्तहान, /
कुछ भी परवाह नहीं, / अकेला भी बहोत बड़ा है इन्सान! / जब आसमान बरसेगा अंगार, / ज़मीन उगलेगी आग, / भाई-बन्द खेल रहे होंगे फाग।/ जब मरु-भू की लू, / रेत से भर मुँह-नाक,/ लेने न देगी साँस, / घुटता होगा दम, / कुटुम्ब-कबीला करता होगा अट्टहास; / और जब प्यास बालू को निचोड़ / हो रही होगी हैरान-- परेशान, / दोस्त अहबाब, / कहीं बैठे, उंटगे, लेटे, / माँग रहे होंगे / शराब और कबाब! | इन्हीं से कहते हो करने को सलाह? जिन्होंने घर से निकाले नहीं कदम, / जानी नहीं मन की उमंग, / झेली नहीं तन की तकलीफ, / पाया नहीं थकान का रस, / लक्ष्य पर पहुँचने का आनन्द। / मैं तो इसके लिए भी हूँ तैयार / कि रेगिस्तान के रेगिस्तान करके पार / अपने सपनों से रहूँ इतनी ही दूर, / जितना था तब, / जब किया था उनके लिए प्रस्थान। / वे आयेंगे नहीं मेरे साथ, / मैं कब बिका था उनके हाथ? / मुझे चाहिए नहीं किसी की सलाह, / मेरे सच्चे सलाहकार हैं | मेरे पाँव; मेरी राह!
मेरे भाई-बन्द / मेरे कुटम्ब-कबीले, / मेरे दोस्त-अहबाब, / तुमसे भी दो बात- / मुबारक हो तुम्हें अपना घर, / घर का आराम; / घर देखना भी है। नहीं कम काम।। मुझे रोकने का मत करो प्रयास, / मुझे अपने पंजों, पिण्डलियों, रानों पर विश्वास। / मैं नहीं जा रहा हूँ पहली बार, बहुतेरे आये हैं | इस पथ को जीत, / बहुतेरे गये हैं | इस पथ से हार,-/ दोनों हैं महान।। आँधी और तूफान / मिटा नहीं पाये हैं | उनके विश्वास भरे आस भरे | पाँव के निशान | आन के पडाव:/वे देंगे साथ. / वे देंगें साथ, / विदा का है समय, / ओ मेरे ईर्ष्यालु, उदासीन, सहदय / अगर दे सको तो दो, लगता नहीं है दाम,/ अपनी शुभ कामना, / अपना आशीर्वाद, / गो उसके बिना भी / लोगों का चलता है काम। / मिले जो मुझे मेरे ख्वाब, / लौटकर उनको करूँगा तुमसे बयान;/ लौटा जो निराश, / करने को उपहास / पाओगे तुम सामान, / या सहानुभूति-नुमा व्यंग का शिकार। / लेकिन मुझे, / या किसी एक को और, / जान लोगे ठीक,/ ज़रा करो गौर, / होगा सबसे बड़ा वरदान, / मेरे सफर में गाया हुआ गान।
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