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जीवनी/आत्मकथा >> बसेरे से दूर बसेरे से दूरहरिवंशराय बच्चन
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आत्म-चित्रण का तीसरा खंड, ‘बसेरे से दूर’। बच्चन की यह कृति आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है और इसकी गणना कालजयी रचनाओं में की जाती है।
और वक्त का यह प्रभाव जीवन भी जानता है, कला भी जानती है। कछ लोग ऐसे हो सकते हैं कि जीवन से मोहभंग होने के बाद भी कला से मोह बनाये रहें या इसके विपरीत कला से मोह-भंग हो जाने पर जीवन से मोह बनाये रहें।
लेकिन जिसके लिए जीवन और कला-मेरे सन्दर्भ में लेखन-माँस-त्वचा के समान जुड़े रहे हैं उसके लिए यह असम्भव है कि जीवन से तो उसका मोह-भंग हो जाये पर लेखन से बना रहे। लेखन से भी मेरा मोह-भंग हो चुका है।
अब आप से क्या छिपाना। तो कह ही दूं-
आत्म-संस्मरण लिखते समय मैं ऐसा समझता था कि मैं अपने जीवन की सच्ची तस्वीर आपके सामने रख सकने में समर्थ हो सकूँगा, पर अब मुझे यह कटु अनुभूति हो गयी है कि जीवन और शब्द एक-दूसरे से बहुत अलग स्तर की चीजें हैं, और एक सतह की चीजें दूसरी सतह पर नहीं चढ़ाई या उतारी जा सकी , नहीं पहुँचाई जा सकतीं; और बहुत ईमानदारी और अध्यवसाय से ऐसा उपक्रम करने पर भी वे ऐसी प्रतिच्छायायें और प्रतिध्वनियाँ बनकर रह जाती हैं, जो जीवन और यथार्थ से बहुत दूर की होती हैं।
दूसरे शब्दों में, मैं यह कहना चाहूँगा कि जीवन का सत्य और शब्द का सत्य अलग-अलग इकाइयाँ हैं। संसार का सारा साहित्य, जो शब्द का साहित्य है, जीवन को पकड़ने का एक बहुत निर्बल और निष्फल प्रयास है। यदि इसे मेरी अतिशयोक्ति न समझा जाये तो मैं कहना चाहूँगा कि जीवन के सत्य और शब्द के सत्य में कोई साम्य नहीं है, और जीवन की दृष्टि से शब्दों का सत्य एक बहुत बड़ा, लेकिन बहुत सुन्दर झूठ है। जो चीज़ रक्त से लिखी जाती है, वह स्याही से लिखी जा सकती है? जो काम हमारी शिराएँ, हमारी माँस-पेशियाँ करती हैं, क्या हम उसे जड़ लेखनी से करा सकते हैं? और हृदय और मस्तिष्क के फलक पर जो मर्मस्पर्शी और मर्मबेधी स्पंदन होते हैं, क्या उन्हें कोरे कागज़ों पर फैलाया जा सकता है? नहीं। नहीं। नहीं।
इस प्रकार, पाठको, (मुझे मानतेन के लहज़े में बोलने के लिए क्षमा करें) मेरी पुस्तक जीवन का एक बहुत बड़ा झूठ है, और मैं कोई वजह नहीं देखता कि आप मेरे शब्दों की सुन्दरता के धोखे में आकर अपनी कामकाजी घड़ियाँ ऐसे बेकार और बे-सार शगल पर सर्फ करें। इसलिए बच्चन की विदा स्वीकार कीजिये
7-7-'77
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