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जीवनी/आत्मकथा >> बसेरे से दूर बसेरे से दूरहरिवंशराय बच्चन
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आत्म-चित्रण का तीसरा खंड, ‘बसेरे से दूर’। बच्चन की यह कृति आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है और इसकी गणना कालजयी रचनाओं में की जाती है।
मुख्यद्वार से प्रवेश करता हूँ तो नेहरूजी कहीं बाहर जाने को निकल रहे हैं. मुझे देखते हैं, उनके मुख की मुद्रा बदलती है, जैसे मन पर से किसी हल्के भार के गिरने पर बदले।
'तुम आ गये, मुझे खुशी है।'
इलाहाबाद की खाँटी माटी का एक सजीव टुकड़ा सामने दिखाई पड़ता है।
वे मीरगंज में पैदा हुए थे।
मैं चक पर पैदा हुआ था। फासला दो फाल्ग का भी नहीं।
इलाहाबाद की माटी, इलाहाबाद की माटी को पहचानती है।
वे निकल जाते हैं।
मैं प्रवेश करता हूँ।
मेरे जीवन का एक अध्याय बन्द होता है,
एक खुलता है।
पाठको, क्या यह अवसर नहीं कि आपसे भी विदा लूँ? आपने मेरी लम्बी आत्मकथा बड़े धैर्य से सुनी, आपका धैर्य टूटे उसके पूर्व मुझे उसे समाप्त कर देना चाहिए, कथा कहने की कोई कला है तो उसका यह सबसे बड़ा गुर।
मुझे इसकी याद न दिलाएँ कि आपने तो चार खण्डों में अपना आत्म-संस्मरण देने को कहा था, और तीन ही पर अपना कलम खींच रहे हैं। अब आपको बता ही दूँ, वह मेरा हथकण्डा था। चार तक के लिए आपको इसलिए तैयार किया था कि कम-से-कम तीन तक तो आप मेरी कहानी से न ऊबें-अभी से ऊबने से कैसे वक्त कटेगा, अभी तो एक खण्ड और आने को है। वह खण्ड उबाने वाला ही होता, अच्छी-से-अच्छी चीज़ से भी आदमी ऊब जाता है। मैं वह उबाने वाली स्थिति आने ही न दूँगा। होशियार साकी, पीने वाले को कुछ प्यासा ही छोड़ देते हैं, अघाकर जाने वाला फिर पलटकर मधुशाला की तरफ नहीं देखता।
इस आत्मचित्रण का ध्येय अपने को आपके सामने प्रस्तुत करना ही नहीं रहा है, अपने को अपने सामने प्रस्तुत करना भी रहा है-जैसे कोई शीशे के सामने खड़े होकर अपने को देखे।
और इसमें सफलता का जो मानदण्ड मैंने रखा था, वह भी आपको बता दूँ।
मैं अपने को आपके सामने ऐसा प्रस्तुत करूँ कि मुझमें आप अपने को भी देख सकें।
और मैं अपने को अपने सामने ऐसा प्रस्तुत करूँ कि उसमें मैं आपको भी देख सकूँ।
शायद आत्म-चित्रण की इससे कठिन कसौटी नहीं हो सकती।
कला और जीवन दोनों इस कसौटी पर चढ़े हैं।
और मुझसे पूछे तो मैं यही कहूँगा कि दोनों इस पर खरे नहीं उतरे। आप इस असफलता की कथा सुनते ऊबे या न ऊबे हों, पर मैं कहते-कहते ऊब उठा हूँ।
झा साहब ने मुझसे कहा था, 'ज़िन्दगी मोह से शुरू होती है, मोह-भंग पर खत्म।' मैंने अपने अनुभव से भी यही जाना है, कविता का जाल समेटते हए 'जाल समेटा' की एक कविता में मैंने कहा था,
(किन्तु अभागे जो ज़्यादा दिन जीते
उनका नशा उतरता,
उनकी आँखों के ऊपर से पर्दा हटता
औ' जीवन की कटु कठोर सच्चाई उनके आगे आती।
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मोह-भंग करना ही तो है काम वक्त का।
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