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जीवनी/आत्मकथा >> बसेरे से दूर बसेरे से दूरहरिवंशराय बच्चन
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आत्म-चित्रण का तीसरा खंड, ‘बसेरे से दूर’। बच्चन की यह कृति आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है और इसकी गणना कालजयी रचनाओं में की जाती है।
कला के लिए उर्वर भूमि जीवन के लिए बंजर सिद्ध हुई-उस पर भाई के और मेरे अपने-अपने नीड़ बसाने के प्रयत्न विफल हुए-भाई के दो बार- मेरा एक बार-पिता-माता ने वह घर अपनी वृद्धावस्था में शान्ति से जीने, शान्ति से मरने के लिए बनवाया था- भाई के और मेरे अशान्ति के तूफानों ने उन्हें न शान्ति से जीने दिया, न मरने- उनकी मौतें तो किसी और भूमि पर बदी थी-
उस भूमि से घबराकर मैंने पहले ही विदा ले ली थी, आज फिर लेता हूँ, ओ मदिरा और आँसुओं की धारा से निमज्जित भूमि, मुझे विदा दो, मैं अब तुमसे बहुत दूर जा रहा हूँ।
दृगों ने मोती की निधि खोल
चुकाया था मदिरा का मोल !
और यह युनिवर्सिटी,
भरद्वाज मुनि जहाँ बसे थे
उसी जगह पर आते-जाते
मेरी आधी उम्र चुकी है
लिखते-पढ़ते और पढ़ाते
उनके यज्ञस्थल पर अब भी
सरस्वती सरिता लहराती,
अनुमानो उसकी गहराई मत मेरी इस अल्प गगर से।
गाता हूँ अपनी लय-भाषा सीख इलाहाबाद नगर से।
कौन कहता है कि भूमि जड़ है? या तप का प्रभाव केवल तपी पर पड़ता है? तपतपी को भी संस्कार देता है, तपोभूमि को भी। यह तप की विष्णुता है, जो जड़ पर भी जयी होती है या भूमि की प्रभविष्णुता, जो अपनी ग्राह्य शक्ति से तप को अपनी ओर खींच लेती है! शायद दोनों। अंग्रेज़ों ने युनिवर्सिटी स्थापित की तो उसी जगह-उसी के पार्श्व में-जहाँ भरद्वाज की तपोभूमि थी। काश, इलाहाबाद युनिवर्सिटी का नाम भरद्वाज विश्वविद्यालय रखा गया होता!
उभरती जवानी से पकती प्रौढ़ता तक मेरा हर दिन युनिवर्सिटी से सम्बद्ध। उसने मुझे बनाया भी, बिगाड़ा भी। उसके बिगाड़ने से जो बचते हैं, वे हैं शेक्सपियरटैगोर। मैं 'अल्प गगर' बनने-बनने के लिए ऋणी। वह मुझे 'टीचर' से 'लेक्चरर' की कोटि में ले गयी। उसने मुझे आगे नहीं बढ़ने दिया, किये को मान, अनकिये को अवमान मत। आखिर में मैं उससे नाराज़ हुआ, मेरे लगाव का ही सबूत, अपनों से ही आदमी नाराज़ होता है, गैर से तो नहीं। खैर, इस विदा के क्षण में, ओ मेरी मातृ शिक्षापीठ, तूने जो मेरी उपेक्षा-अवहेलना की, उसे मैं भूलता हूँ; मुझे विदा दे, मैं तुमसे अब दूर जा रहा हूँ।
और अन्त में स्मृति पटल पर उतरते हैं कुण्डूबाग, बैंक रोड, स्ट्रेची रोड, एडेल्फी और 17, क्लाइव रोड के बंगले, तेजी के मधुर, मनोरम, मनस्वी, तेजस्वी सान्निध्य में, जो अपने आप में यह आश्वासन है कि कैसी भी परिस्थिति आये, कैसा भी परिवर्तन, वह उसे मनोनुकूल बनाने की क्षमता रखता है। उनके भौतिक अंग से विदा तो लूँ, पर उनके मानसिक, भावात्मक, संस्कारात्मक अंग को साथ भी रखू-भविष्य की कठिन-कुरूप स्थिति को सुन्दर मनोज्ञ बनाने के लिए, सरस, मनभावन बनाने के लिए।
इलाहाबादं से विदा लेने में बड़ी देर लग गयी। कहाँ ? एक क्षण ही तो बीता है। लिखने में ज़्यादा देर लगी, जीने में बहुत-बहुत कम। अनुभूति के क्षण घड़ी की सुई से नहीं नपते। हज़रत मुहम्मद सातवें आसमान पर चढ़े और उतरे, पास की एक सुराही लुढ़क गयी थी, पानी अभी उससे बह ही रहा था।
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