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जीवनी/आत्मकथा >> बसेरे से दूर बसेरे से दूरहरिवंशराय बच्चन
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आत्म-चित्रण का तीसरा खंड, ‘बसेरे से दूर’। बच्चन की यह कृति आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है और इसकी गणना कालजयी रचनाओं में की जाती है।
हे गंगा-जमुना-सरस्वती की श्वेत, श्याम, रतनार धारा के संगम और इन तीनों प्रतीकों के पीछे न जाने कितनी त्रयियों के मिलनस्थल, तुममें डुबकी लगा, तुम्हारे समन्वयी-जल में तन-मन-प्राण निमज्जित कर तुमसे दूर जा रहा हूँ, मुझे विदा दो!
और यह बँधवा के नीचे लेटे हनुमान-हनुमान की अन्य कोई लेटी मूर्ति मैंने नहीं देखी-मूर्ति यह है भी नहीं, साक्षात हनुमान हैं- माँ ने बताया था-राम-रावण युद्ध के पश्चात् गंगा में नहाकर अपना श्रम शान्त करने आये थे, और तट पर यह कहकर लेट गये थे, 'बहुत थक गया हूँ,' तब से उठे ही नहीं। मेरे शंकालु मन ने पूछा था, 'पर, माँ, उनकी आँखें तो खुली हैं।' माँ ने बताया था, वे सोते भी जागते हुए हैं, हम जागते भी सोये हुए हैं।' माँ की बात समझ में न आयी थी, विश्वास से मान ली थी। अब समझता हूँ, बड़ी बात कही थी माँ ने। हे बँधवा के सोते हुए जागते हनुमान, मुझे विदा दो, मैं अब तुमसे दूर जा रहा हूँ।
और यह दारागंज-इसका नाम तो गंगागंज होना चाहिए था-गंगागंज भी है प्रयाग में, पर गंगा से दूर, दारागंज पर व्यंग्य करता-यह गंगा से पोषितों की बस्ती, उसके पूजकों और शोषकों की भी-गंगा के दरबार से उठकर लोग सीधे महादेव की बारात में शामिल हो सकते हैं-इस दारागंज पर एक दिन कविर्मनीषी निराला की उदास, पागल, पर सशक्त छाया, जैसे किसी देव की, पड़ने लगी, और एक दिन यह पूरा मोहल्ला उससे आच्छादित हो गया-दारागंज का नाम लेना उस छाया को अपने ऊपर अनुभव करना-सा लगता- उस बस्ती में प्रवेश करते ही कितनी बार उस छाया ने मुझे विचार-विचलित किया है। - उस छाया की स्मृतियों से अब सदा को जुड़ी दारागंज की धरती, मुझे विदा दो, मैं तुमसे दूर जा रहा हूँ।
यह कीटगंज-गंगापुत्रों की बस्ती-इन्हीं में से एक के घर चम्पा ने जन्म लिया था-उसी घर में उसने देह-त्याग भी किया-एक दिन उसने अपनी देह में मुझे डुबा लिया था, एक दिन अपनी आत्मा में 'देवि, माँ, सहचरि, प्राण' पंत की कल्पना में ही रही होगी–मैंने उसे साक्षात देखा था-चम्पा को जन्म देकर उसे अपने में आत्मसात भी कर लेने वाली कीटगंज की धरती, मुझे विदा दो, मैं तुमसे दूर जा रहा हूँ।
यह चक-मेरे बाल-काल और प्रथम तरुणाई का चक, अब काल के गाल में जा चुका है उसकी स्मृति केवल दो जगहों पर अब भी बनी है-या तो चकेसरी देवी के चक्षुओं में या फिर मेरी आँखों में-चक की याद करते, विदेश मन्त्रालय के प्रवेश द्वार की ऊँची मेहराब के नीचे खड़े होकर, मेरे मुँह से निकला था-'क्या भूलूँ क्या याद करूँ'-- मुझे उस दिन क्या पता था कि एक दिन ये सजीव स्मृतियाँ जड़ पुस्तक हो जायेंगी। हे मेरी बाल-क्रीड़ा और चढ़ती जवानी की भूमि, तुम पर चित्रण कर कितना तरोताज़ा हो जाता था, कितना विषाद-उदास भी, मुझे विदा दो, मैं अब तुमसे दूर जा रहा हूँ।
यह कायस्थ-पाठशाला-- मेरी शिक्षास्थली-अब वहाँ प्रेम है, हिन्दुस्तानी अकादमी है-यहाँ कितना पढ़ा-लिखा, कितना खेला-कूदा, कितनी शैतानियाँ की-एक बार एक हथेली पर एक दर्जन बेंत भी खाई थीं-आखिरी चोट पर बेंत पकड़ ली थी-वह मेरी मुट्ठी में लेखनी हो गयी थी-लिखते-लिखते कभी थका हूँ तो वे बारह बेंतें याद हो आयी हैं-तूने उधड़ी हुई हथेली से बेंत पकड़ ली थी, कलम छोड़ देगा!-हे मेरे खेल, पढ़ाई, मुरहाई की भूमि, मुझे विदा दो, मैं तुमसे दूर जा रहा हूँ।
और यह कटघर का हमारा नया मकान-पिताजी का बनवाया और उसका सारा परिवेश स्मृति पर इस प्रकार टूटता है जैसे किसी पतझरी हवा में वृक्ष के पत्तेयह जमुना रोड-मिशन कॉलेज का कम्पाउण्ड-जमुना तट-जमुना का नीलम-नील प्रवाह-इस तरफ बारादरी, राजा बनारस की कोठी-उस तरफ जमुना पुल, लँगड़ी कोठी-उस पर जमुना का बलुहा किनारा-बरसातों में जल निमग्न, जाड़ों में उस पर धूप सेंकते कच्छप-दो-चार मगरमच्छ भी-गरमी में उस पर खरबूजे-तरबूजे ककड़ी के खेत-तैरने-नौका चलाने वाली बाँहों के लिए जमुना की चौड़ी छाती खेल का मैदान-जिस भूमि पर, 'मधुशाला', 'निशा-निमन्त्रण' ऐसी रचनाएँ लिखी गयीं, उस पर उन्माद और अवसाद की सीमाओं को छूने वाली कैसी-कैसी घटनाएँ घटी थीं।
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