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जीवनी/आत्मकथा >> बसेरे से दूर बसेरे से दूरहरिवंशराय बच्चन
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आत्म-चित्रण का तीसरा खंड, ‘बसेरे से दूर’। बच्चन की यह कृति आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है और इसकी गणना कालजयी रचनाओं में की जाती है।
फूलपुर तहसील का रामापुर गाँव-मेरी परदादी बुआ की ससुराल-उनके वैधव्य को कितना त्रासा गया था वहाँ-कष्ट-गाथा रोंगटे खडे करती थी-मैंने उसकी माटी पर कभी पैर न रखा–पर उनका नाम मेरे लिए सांसारिक क्रूरता का केन्द्र बन गया था-तुमने मुझे यह देख सकने के लिए तैयार किया था कि दुनिया का ज़ोर-जुल्म किस हद तक जा सकता है और उन्हें सहने की ज़िद भी दी थी। हे रामापुर की माटी, मेरी कृतज्ञता स्वीकारो, मुझे विदा दो, तुमसे अब मैं बहुत दूर जा रहा हूँ।
और यह झूसी अरैल,-जमुना-गंगा और उनकी सम्मिलित धारा से बँटे तीन भू-भागों में से दो पर-झूसी, पुराना प्रतिष्ठानपुर, शंकराचार्य और कुमारिल भट्ट के शिष्य भास्कराचार्य की साधना-पीठ; साधक, साधु-संन्यासियों का आज भी आश्रम, दारांगज और झूसी के बीच में गंगा बहती, जैसे राग और विराग के बीच में मोहन चाचा शहर से झूसी पहुँच सन्यस्त हो गये थे-और कितने ही हुए होंगे-अरैल, महाप्रभ वल्लभाचार्य के चरण-रज से पवित्र तीर्थ-गद्दी पर पजा-आरती नित्य होती है-कितनी बार आरती में खड़े होने की याद-कर्कल भी साथ-आचार्य ने किन आँखों से सारी सृष्टि को मधुर देखा होगा-'सृष्टिर्मधुरा'-और मैं सन्देह, शंका संशयों का सताया सृष्टि को तिक्त भी पाता हूँ- बहुत दिन बाद समझा कि उन्होंने सृष्टि नियन्त्रक 'यष्टि' को भी मधुर देख लिया था-'यष्टिर्मधुरा'- यही तो तिक्त है-मधुर को मधुर के साथ तिक्त को भी मधुर पा लिया था। उनकी पूर्ण दृष्टि सदा प्रयाग पर पड़ती रहे! हे पावन भूमियो, तुमसे दूर जा रहा हूँ, मुझे विदा दो!
और यह बारा- मेरे नाना-मामा की पैतृक भूमि, मेरी माँ की बाल क्रीड़ा-स्थली-पूर्वजों ने पढ़ने को 'रामचरितमानस' उर्दू अक्षरों में लिखा रखा था-प्रति अब भी मेरे पास-ननिहाल में खेती-बारी होती थी-माँ को खेतिहर-जीवन की कितनी झाँकियाँ देशकाल की दूरी पर भी स्पष्ट-वृद्धावस्था में भी उमड़े बादलों को देखकर कहीं, 'सहर में बरसे तुम्हार पानी नार-नरवा में बहि जाई; हे बादर, जाव, बारा में बरसौ।' ओ बारा के हरे-भरे खेतो, जिनकी मेड़ों पर मैं संभल-संभल चला हूँ, मुझे विदा दो, मैं तुमसे दूर जा रहा हूँ।
यह सिराथू का रूपनारायण पुर-श्यामा की काया यहीं की माटी से बनी थी-काश तुम्हारा नाम रूपलक्ष्मी पुर होता!-तुम्हारी माटी का उससे अधिक सिद्ध-समृद्ध उपयोग हुआ हो तो मुझे बताओ-वहाँ श्यामा के साथ बितायी गयी रातें-चाँदनी रातें-प्रश्न उठा था, वह धवलिमा चाँद की थी या श्यामा के व्यक्तित्व की!
पास कड़े की देवी का जलहरी-एक बार माता-पिता कोई मन्नत पूरी करने को मुझे वहाँ लिवा ले गये थे-कहते हैं, देवी असन्तुष्ट हों तो जलहरी नहीं भरती। मुझसे तो भर गयी थी। देवी के असन्तुष्ट होने का कोई कारण मैंने न दिया होगा। निकट ही मलूकदास की गद्दी-सन्त वे आलसियों के या परमहंसों के-
अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम
दास मलूका कह गये, सबके दाता राम।
गही से मैंने एक आवाज़ सुनी थी-'तू न अजगर, न पंछी, न दास मलूका-सा आस्थावान कि सर्वथा राम-निर्भर हो, तू काम कर!' तुम्हारा यह सन्देश मेरी तरह सब सुनें। तुम्हारी गद्दी से दूर जा रहा हूँ, सन्त, मुझे विदा दो!
परिक्रमा पूर्ण हुई।
अब आँखों के सामने संगम आता है-
कुमारिल भट्ट के तुषाग्नि में आत्मदाह का,
सम्राट हर्ष के सर्वस्व दान का,
सन्त ज्ञानेश्वर के संन्यासी-गृहस्थ पिता-माता की जल-समाधि का,
कितने मेले पर्वों का,
कितने-कितने लोगों के अस्थि-प्रवाह का,
'ऊँचा से ऊँचा भी अन्तिम बार
यहाँ रज कण बन आता!'
स्मृतियाँ जगाऊँगा...
तो लहरें नहीं तरंगें उठेंगी
सागर उमड़ेगा, प्रलयार्णव
और उसी में मैं डूब जाऊँगा।
दीर्घाय मार्कंडेय मुनि को तो अक्षय वट के पत्ते का सहारा मिल गया
था- मुझ अल्पायुष्य को वह भी न मिलेगा-
'वृक्ष अक्षयवाट सनातन
जहाँगीरी हुक्म से काटा गया था
और उसकी जड़ जला डाली गयी थी।'
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