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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
व्याख्यान
19
प्रतिरोध और दमन*
अब हमें स्नायु-रोगों को समझने की दिशा में बढ़ने के लिए और तथ्यों की
आवश्यकता है। हमारे पास ही दो प्रेक्षण मौजूद हैं। दोनों बड़े ध्यान देने
योग्य हैं और शुरू में बड़े आश्चर्यजनक थे। आप हमारे पिछले साल किए गए कार्य
से उन दोनों के लिए निःसन्देह तैयार हो चुके हैं।
पहला : जब हम किसी रोगी के लक्षणों का इलाज करने का कार्य अपने ऊपर लेते हैं,
तब वह इलाज के सारे समय हमारा जोरदार और लगातार विरोध करता है। यह ऐसी
असाधारण बात है कि हम इसमें आपका बहुत विश्वास होने की आशा नहीं करते। सबसे
अच्छी बात यह है कि रोगी के रिश्तेदारों से इसके बारे में कुछ न कहा जाए,
क्योंकि वे सदा यह समझते हैं कि हमने इलाज को लम्बा खींचने के लिए या इलाज के
व्यर्थ हो जाने पर यह बहाना तैयार कर रखा है। रोगी में इस प्रतिरोध के सब
प्रकट रूप दिखाई देते हैं, यद्यपि वह इन्हें इस रूप में नहीं पहचानता, और हम
उसे यह तथ्य अनुभव करा दें, तब समझिए कि एक बहुत बड़ी बाधा पार कर ली। यह
सोचना कि रोगी, जिसके लक्षण उसे और उसके रिश्तेदारों को इतना कष्ट दे रहे
हैं, और जो उनसे छूटने के लिए समय, धन और परिश्रम का इतना त्याग और आत्मविजय
करने को तैयार है, वह अपने रोग को दूर करने के लिए प्रस्तुत सहायता का
प्रतिरोध करे-यह बात कितनी असम्भाव्य लगती है, पर तो भी यह सच हैं, और यदि इस
असम्भाव्यता के आधार पर हमारी निन्दा की जाए, तो हम यही जवाब दे सकते हैं कि
यह कोई अनोखी या बेमिसाल बात नहीं है, क्योंकि भयंकर दांत-दर्द से पीड़ित जो
आदमी दांत-डाक्टर के पास जाता है, वह भी डाक्टर के जम्बूर निकालने पर उसको
पकड़कर रोकने की कोशिश करता है।
रोगियों में दिखाई देने वाला यह प्रतिरोध बड़े विविध रूपों वाला और अत्यधिक
सूक्ष्म होता है; प्रायः इसे पहचानना कठिन होता है, और इसके नाना रूप बहुत
जल्दी-जल्दी बदलते रहते हैं। विश्लेषण को लगातार सन्देहशील और इसके विरुद्ध
सावधान रहने की आवश्यकता है। मनोविश्लेषण द्वारा चिकित्सा में हम उस विधि का
प्रयोग करते हैं जिसे आप स्वयं-निर्वचन के सिलसिले में देख चुके हैं : हम
रोगी से कहते हैं कि वह शान्तिपूर्वक आत्मप्रेक्षण करे, 'कुछ भी सोचने की
कोशिश न करे' और इसके बाद उसे अन्दर से जिस बात का ज्ञान हो, उस
सबको-भावनाओं, विचारों और स्मृतियों को-उसी क्रम से बताया जाए जिस क्रम से वे
उनके मन में पैदा होती हैं। हम उसे साफ चेतावनी दे देते हैं कि वह किसी ऐसे
कारण से प्रभावित न हो जो उसे उन मनोबिम्बों (साहचर्यों) में से किसी को
छांटने या छोड़ने को प्रेरित करें, चाहे वे बहुत 'बुरे लगने वाले', या 'न
कहने योग्य', या बहुत 'महत्त्वहीन' या 'अप्रासंगिक' या 'अर्थहीन' ही हों। हम
उसके मन में यह बात बैठाते हैं कि उसे सिर्फ यह बात पकड़नी है जो उसके मन में
चेतन रूप से ऊपरी तल पर है और जो कुछ उसे प्राप्त हो, उस पर होने वाली सब तरह
की आपत्तियों को छोड़ देना है, चाहे वे किसी भी रूप में हों। और हम उससे कह
देते है कि उसके इलाज की सफलता, और सबसे बढ़कर, इसमें लगने वाला समय, इस बात
पर निर्भर होगा कि यह कहां तक इस आधारभूत शास्त्रीय नियम पर सच्चाई से कायम
रह सकता है। स्वप्न-निर्वचन की विधि से हमें पता चला था कि ठीक उन्हीं
साहचर्यों में अचेतन का ज्ञान कराने वाली सामग्री होती है जिनके विरुद्ध
असंख्य सन्देह और आपत्तियां पैदा होती हैं।
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*Resistance and Repression
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