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विविध >> मनोविश्लेषण मनोविश्लेषणसिगमंड फ्रायड
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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
यह शास्त्रीय नियम लागू करने के परिणामस्वरूप पहली बात यह होती है, कि सबसे
पहले इसी का प्रतिरोध किया जाता है; रोगी प्रत्येक संयत उपाय द्वारा इससे
बचने की कोशिश करता है। पहले वह कहता है कि मेरे दिमाग में कुछ भी नहीं आता;
फिर वह कहता है कि मेरे दिमाग में इतनी सारी बातें आती हैं कि मैं उनमें से
किसी को पकड़ नहीं सकता। फिर हम नाराजी और आश्चर्य से देखते हैं कि वह अपनी
आलोचनाओं और आक्षेपों में से कभी किसी के और कभी किसी के वश में हो जाता है।
यह बात उसकी बातचीत में आने वाली लम्बी चुप्पियों से दिखाई देती है। अन्त में
वह मान लेता है कि वास्तव में मैं कुछ नहीं कह सकता, मुझे शर्म आती है, और वह
अपने वायदे को तोड़कर इस भावना के वश में हो जाता है; अथवा उसने कोई बात सोची
है जो स्वयं उस पर लागू नहीं होती, बल्कि किसी और पर लागू होती है, और इसलिए
वह उस नियम का अपवाद है; अथवा, जो कुछ मैंने अभी सोचा है, वह बिलकुल
महत्त्वहीन, मूर्खतापूर्ण और बेहूदा है, और आपका यह आशय कभी नहीं हो सकता कि
मैं ऐसे विचारों पर ध्यान दूं। इस तरह अनेक रूपों में यह बात चलती है जिस पर
यही उत्तर दिया जाता है कि प्रत्येक बात बताने का अर्थ वास्तव में प्रत्येक
बात बताना ही है।
ऐसा कोई रोगी नहीं मिलता जो अपने विचारों के कुछ अंश पर रोक लगाने की कोशिश न
करता हो, ताकि वे विश्लेषण की पहुंच से सुरक्षित रहें। एक रोगी ने, जो
सामान्यतया विशेष रूप से बुद्धिमान था, एक बहुत घनिष्ठ प्रेम-सम्बन्ध इस तरह
कई सप्ताह मुझसे छिपाए रखा। जब उससे कहा गया कि तुमने उस पवित्र नियम को
तोड़ा है, तब उसने सफाई में यह दलील पेश की कि मैं इस किस्से को अपना निजी और
गोपनीय मामला समझता था। स्वभावतः विश्लेषण का इलाज इस तरह की गोपनीयता का
अधिकार नहीं मान सकता। इस तरह तो कोई आदमी यह भी कह सकता है कि वियेना जैसे
शहर के कुछ हिस्सों को अपवाद माना जाए, और बाज़ार में या सेंट स्टीफन के चर्च
के चौराहे पर कोई गिरफ्तारी न की जाए, और फिर किसी फरार आदमी को पकड़ने की
कोशिश की जाए। निश्चित ही है कि वह उन सुरक्षित स्थानों के अलावा और कहीं
नहीं जाएगा। एक बार मैंने एक आदमी को इस तरह की बात का अपवाद करने की अनमति
देने का निश्चय किया. क्योंकि मेरी बहत कछ सफलता इस बात पर निर्भर थी कि वह
अपना कार्य का सामर्थ्य फिर प्राप्त कर ले और सरकारी कर्मचारी के नाते वह इस
शपथ से बंधा हुआ था कि कुछ बातें मैं किसी व्यक्ति को नहीं बताऊंगा। यह सच है
कि वह परिणाम से सन्तुष्ट था, पर मैं सन्तुष्ट नहीं था। मैंने ऐसी अवस्थाओं
में फिर कभी विश्लेषण न करने का फैसला कर लिया।
मनोग्रस्तता के रोगी इस बात में बड़े निपुण होते हैं कि वे अपनी अति
सत्यनिष्ठा और सन्देह को इस शास्त्रीय नियम पर लगाकर इसे प्रायः बेकार कर
देते हैं। चिन्ता-हिस्टीरिया के रोगी कभी-कभी सिर्फ वे साहचर्य पैदा करते हैं
जो अभीष्ट साहचर्यों से बहुत दूर होते हैं, और विश्लेषण योग्य कोई चीज़ नहीं
प्रस्तुत करते, और इस तरह इस नियम को बेकार करने में सफल हो जाते हैं। पर
मेरा आशय आपको इलाज की शास्त्रीय या टेक्निकल कठिनाइयों का परिचय देना नहीं।
इतना ही जानना काफी है कि संकल्प और अध्यवसाय द्वारा हम रोगियों से इस विधि
के नियम का कुछ पालन कराने में सफल हो जाते हैं, और तब प्रतिरोध बिलकुल दूसरा
रास्ता अपना लेता है। यह बौद्धिक विरोध के रूप में आता है, दलीलों को
हथियारों की तरह इस्तेमाल करता है, और उन सब कठिनाइयों और असम्भाव्यताओं को
अपने प्रयोग में लाता है, जो प्रकृत, पर विषय से अनभिज्ञ, व्यक्ति के तर्क को
विश्लेषण के सिद्धान्तों में दिखलाई देती हैं। तब हमें उस रोगी के मुंह से वह
सब आलोचना और आक्षेप सुनने पड़ते हैं जो वैज्ञानिक पत्र-पत्रिकाएं सम्मिलित
स्वर में हमारे चारों ओर दहाड़ती रहती हैं। बाहरी. आलोचक हमारे ऊपर जो कुछ
कहते हैं उसमें कोई नई बात नहीं। असल में वह बात का बतंगड़ है। फिर भी, रोगी
से दलील की जा सकती है। वह यह देखकर बड़ा खुश होता है कि हम उसे समझाएं,
पढ़ाएं, हराएं और उपयोगी साहित्य बताएं, ताकि वह और अधिक सीख सके। वह इस शर्त
पर मनोविश्लेषण का समर्थक होने के लिए पूरी तरह तैयार है कि विश्लेषण
व्यक्तिगत रूप में उसे बख्श दे। पर ज्ञान की इस अभिलाषा में हमें प्रतिरोध
स्पष्ट दीखता है। यह प्रस्तुत विषय से हटाना है, और हम इसे नहीं चलने देते।
मनोग्रस्तता-रोग में प्रतिरोध एक विशेष चाल चलता है, जिसके लिए हम बिलकुल
तैयार होते हैं। यह विश्लेषण को बिना बाधा के इसके रास्ते पर चलने देता है,
यहां तक कि केस की समस्याओं पर अधिकाधिक प्रकाश पड़ता जाता है, पर अन्त में
हमें यह आश्चर्य होने लगता है कि इन स्पष्टीकरणों का कोई क्रियात्मक परिणाम
क्यों नहीं होता, और लक्षणों में उनके अनुरूप सुधार क्यों नहीं होते? तब हमें
पता चलता है कि प्रतिरोध मनोग्रस्तता-रोग की एक विशेषता, अर्थात् सन्देह पर
आकर टिक गया है, और इस किले से हमें सफलतापूर्वक दूर रख रहा है। रोगी अपने मन
में कुछ इस तरह की बात कह रहा है, 'यह सब बात बड़ी सुन्दर और मनोरंजक है। मैं
इसे जारी रखना चाहता हूं। मुझे निश्चय है कि यदि यह सच हो तो इससे मुझे बड़ा
लाभ होगा, पर मुझे इसमें ज़रा भी विश्वास नहीं है, और जब तक मुझे इस पर
विश्वास नहीं, तब तक इसका मेरे रोग पर कोई असर नहीं होगा।' इस तरह बहुत समय
तक सिलसिला चलता रहता है, और अन्त में हम इस मनोभाव पर ही पहुंच जाते हैं, और
फिर निर्णायक संघर्ष शुरू होता है।
बौद्धिक प्रतिरोध ही सबसे कठिन नहीं होते। इनको सदा हटाया जा सकता है, पर
रोगी जानता है कि खास विश्लेषण की सीमाओं में प्रतिरोध किस तरह कायम किए
जाएं, और इनको पराजित करना इस विधि के सबसे कठिन कार्यों में से है। अपने
पिछले जीवन की कुछ भावनाओं और मन की अवस्थाओं को याद करने के बजाय वह उन्हें
पुनः पैदा कर लेता है, और उनमें से कुछ में, चिकित्सक और इलाज का मुकाबला
करता हुआ, 'स्थानान्तरण'1 नामक उपाय द्वारा पुनः रम जाता है या जीने लगता है।
यदि रोगी पुरुष है तो वह यह सामग्री प्रायः अपने पिता के साथ अपने सम्बन्ध से
लेता है, जिसके स्थान पर अब उसने डाक्टरों को रख लिया है; और ऐसा करते हुए वह
व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता और निर्णय की स्वतन्त्रता प्राप्त करने के संघर्षों
में से अपनी उस आकांक्षा में से, जिसका पहला लक्ष्य पिता के समान बनना, या
उससे बढ़ जाना था, या अपने जीवन में दूसरी बार कृतज्ञता का भार अपने ऊपर लेने
की अपनी अरुचि में से प्रतिरोध खड़े कर लेता है। कभी-कभी ऐसा समय आता है,
जिसमें यह महसूस होता है कि रोगी की विश्लेषण को गलत सिद्ध करने की, उसकी
असमर्थता सिद्ध करने की, उस पर विजय प्राप्त करने की, इच्छा ने उसकी अपने रोग
का अन्त करने की उचिततर इच्छा को पूरी तरह निकाल भगाया है। स्त्रियों में यह
प्रतिभा होती है कि वे विश्लेषक पर किए गए एक कोमल, कामुकता से अंकित,
स्थानान्तरण द्वारा प्रतिरोध कायम रख सकती हैं। जब यह आकर्षण एक विशेष
तीव्रता पर पहुंच जाता है, तब इलाज की असली परिस्थिति में सारी दिलचस्पी उड़
जाती है, और साथ ही इलाज आरम्भ करने के समय की गई सब प्रतिज्ञाएं भी उड़ जाती
हैं। चाहे कितनी भी नर्मी से आप उस भाव को तिरस्कृत करें, पर उसके
परिणामस्वरूप पैदा होने वाली अनिवार्य ईर्ष्या और वैमनस्य से चिकित्सक के साथ
व्यक्तिगत सम्बन्ध को अवश्य हानि पहुंचेगी, और इस तरह विश्लेषण में प्रयुक्त
एक अत्यन्त शक्तिशाली प्रेरक बल प्रभावहीन हो जाएगा।
इस तरह के प्रतिरोधों की संकीर्ण भाव से निन्दा या तिरस्कार नहीं करना चाहिए।
उनमें रोगी के पिछले जीवन की इतनी सारी सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण सामग्री होती
है और वे इतने निश्चायक तरीके से उसे वापस ले आते हैं कि यदि उन्हें ठीकठीक
उपयोग में लाने के लिए कौशलपूर्ण विधि का सही ढंग से प्रयोग किया जाए तो वे
विश्लेषण के लिए बहुत अधिक सहायक सिद्ध होते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है
कि यह सामग्री पहले सदा प्रतिरोध का कार्य करती है, और ऐसे रूप में सामने आती
है जो इलाज का विरोधी होता है। यह कहा जा सकता है कि वे चरित्र के गण हैं,
अहंकारी की व्यक्तिगत अभिव्यक्तियां या रुख हैं जो प्रस्तुत परिवर्तनों का
विरोध करने के लिए इस तरह इकट्ठे हो जाते हैं। तब यह पता चलता है कि
स्नायु-रोग की दशाओं के प्रसंग में, और इसकी आवश्यकताओं के विरोध में
प्रतिक्रिया के रूप में ये चरित्र-गुण कैसे परिवर्धित हुए हैं, और इस चरित्र
में वे विशेषताएं दिखाई देती हैं जो अन्यथा न दिखाई देती,या कम-से-कम इतने
स्पष्ट रूप से न दिखाई देती अथात् जिन्हें हम गुप्त कह सकते हैं। आपको यह
धारणा नहीं बनानी चाहिए कि हम इन प्रतिरोधों को ऐसा अकल्पित खतरा मानते हैं,
जो हमारे विश्लेषण के प्रभाव को हानि नहीं पहुंचा सकता है। नहीं, हम जानते
हैं कि ये प्रतिरोध अवश्य प्रकट होंगे, बल्कि हम तब असन्तोष अनुभव करते हैं
जब उन्हें काफी सुनिश्चित रूप से उबुद्ध न कर सकें, और रोगी को उनका इस रूप
में ज्ञान न करा सकें। सच तो यह है कि हम अन्त में यह समझते हैं कि इन
प्रतिरोधों को दूर करना विश्लेषण का आवश्यक कार्य है, और इसे करने पर ही यह
निश्चित होता है कि हमने रोगी के लिए कुछ सफलता प्राप्त की है।
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1. Transference
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