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मनोविश्लेषण

सिगमंड फ्रायड

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :392
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 8838
आईएसबीएन :9788170289968

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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद



व्याख्यान

22

परिवर्धन और प्रतिगमन के अनेक पहलू : *कारणता

जैसा कि हम देख चुके हैं, राग-कार्य प्रकृत कहलाने वाली रीति से प्रजनन-कार्य का साहयक बनने से पहले एक लम्बे परिवर्धन में से गुज़रता है। अब मैं स्नायु-रोगों के कार्य-कारण-सम्बन्ध में इस तथ्य का महत्त्व बताऊंगा।

मैं समझता हूं कि यह मान्यता साधारण रोग-विज्ञान के सिद्धान्तों के अनुसार ही है कि ऐसे परिवर्धन में दो खतरे रहते हैं : पहला निरोध1 का और दूसरा प्रतिगमन2 का। कहने का मतलब यह है कि जैविकीय प्रक्रमों में परिणमन या भिन्नता होने की व्यापक प्रवृत्ति के कारण यह आवश्यक है कि इन सब प्रारम्भिक कलाओं को उतनी ही सफलता से पार नहीं किया जा सकेगा और उतने ही पूर्णरूप से उनसे आगे वृद्धि नहीं हो सकेगी। कार्य के कुछ हिस्से इन आरम्भिक अवस्थाओं में स्थायी रूप से अवरुद्ध हो जाएंगे, जिसका परिणाम यह होगा कि साधारण परिवर्धन के साथ थोड़ा-सा निरुद्ध परिवर्धन भी चलता जाएगा।

दूसरे क्षेत्रों में इन प्रक्रमों जैसे प्रक्रम खोजने चाहिए। जब कोई सारी की सारी जाति अपने वासस्थान को छोड़कर नये देश की खोज में निकलती थी, जैसा कि मानव इतिहास के आरम्भिक काल में बहत होता था. तब वे सबके सब लोग निश्चित ही नई मंज़िल पर नहीं पहुंचते थे। और कारणों से होने वाली हानियों के अलावा, सदा ऐसा भी अवश्य हुआ होगा कि देश छोड़ने वाले लोगों के छोट-छोटे समूह या टोलियां रास्ते में रुक गई होंगी, और पड़ावों पर ही बस गई होंगी; जबकि शेष लोग आगे चलते गए होंगे। या एक और अधिक पास का सा दृश्य लीजिए। आप जानते हैं कि ऊंचे स्तन्यपायियों में वीर्य-ग्रन्थियां, जो शुरू में उदर-विवर में बहत नीचे होती हैं, गर्भाशय के अन्दर होने वाले परिवर्धन को एक निश्चित काल पर संचलन करने लगती हैं, जिससे वे श्रौणि3 के सिरे की त्वचा के लगभग नीचे आ जाती हैं। कुछ नरों में यह देखा जाता है कि अंगों की इस जोड़ी में से एक श्रौणि-विवर में रह गई है, या इसने इंग्वाइनल कैनाल (वंक्षण नाली) में, जिसमें से इन दोनों को गुज़रकर आना था, अपना स्थायी स्थान बना लिया है, अथवा यह होता है कि नाली जो प्रकृत रूप से वीर्य-ग्रन्थियों के इसमें से गुज़र जाने के बाद बन्द हो जानी चाहिए, बन्द नहीं हुई है। जब छात्रावस्था में वी० ब्रुक की देख-रेख में वैज्ञानिक गवेषणा का पहला काम कर रहा था, तब मैं एक छोटी मछली की, जो अभी बड़े आद्य या अति प्राचीन रूप में थी, मेरु-रज्जु (स्पाइनल कौड) में पृष्ठीय स्नायु-मूलों (डौर्सल नर्व-रूट्स) के उद्गम पर कार्य कर रहा था। मैंने देखा कि इन मूलों के स्नायु-तन्तु भूरे द्रव्य (ग्रेमैटर) के पश्चसींग (पोस्टीरियर हान) पैदा होते थे-यह अवस्था अब दूसरे पृष्ठवंशियों (वर्टेब्रेट्स) में नहीं पाई जाती, पर कुछ ही समय बाद मैंने देखा कि वैसी ही स्नायु-कोशिकाएं (नर्व-सेल्स) पश्च मूलों की तथाकथित स्पाइनल गैगलियोन (मेरु-प्रगंड) की सारी लम्बाई पर भूरे द्रव्य से बाहर भी मौजूद थीं, जिससे मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि हरे गैंगलियोन की कोशिकाएं स्नायु-मूलों के साथ-साथ मेरु-रज्जु (स्पाइनल कौर्ड) से बाहर चली गई हैं। विकासात्मक परिवर्धन (एवोल्यूशनरी डेवलपमेंट) से भी यह बात मालूम होती है, पर इस छोटी-सी मछली में सारे रास्ते पर वे कोशिकाएं मौजूद थीं, जो रास्ते में रुद्ध' हो गई थीं। बारीकी से विचार करने पर आपको तुरन्त पता चल जाएगा कि इन तुलनाओं में कहां-कहां कमजोरियां हैं। इसलिए मैं सिर्फ इतना कहता हूं कि हमारी राय में यह हो सकता है कि प्रत्येक पृथक् यौन-आवेग के एकाकी अंश परिवर्धन की किसी आरम्भिक अवस्था में रहे हों, जबकि उसी समय इसके दूसरे अंश अपने अन्तिम उद्देश्य पर पहुंच गए हों। इससे आपको पता चलेगा कि ऐसे प्रत्येक आवेग को हम जीवन के आरम्भ से निरन्तर बहती हुई धारा मानते हैं, और हमने इसके प्रवाह को कृत्रिम रूप से, पृथक् क्रमिक तथा अग्रगामी संचलनों में कुछ सीमा तक विभाजित कर दिया है। आपकी यह धारणा सही है कि इन मान्यताओं का और स्पष्टीकरण होना चाहिए, पर अधिक स्पष्टीकरण की कोशिश से हम अपने विषय से बहुत बाहर चले जाएंगे; इस समय हम आरम्भिक अवस्था में घटक-आवेग में होने वाले इस रोध या रुकावट को (आवेग की) बद्धता कहेंगे।

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*Aetiology
1. Inhibition
2. Regression
3. Pelvic

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