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‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टु साइको-अनालिसिस’ का पूर्ण और प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद
व्याख्यान
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स्वप्नों में अतिप्राचीन और शैशवीय विशेषताएं
अब हम अपने इस निष्कर्ष से फिर नये सिरे से आगे बढ़ते हैं कि सेन्सरशिप या
काट-छांट के प्रभाव से स्वप्नतन्त्र गुप्त स्वप्न-विचारों को दूसरे रूप में
बदल देता है। ये विचार उसी तरह के होते हैं जैसे जाग्रत जीवन के सुपरिचित
चेतन विचार। वे जिस नये रूप में प्रकट होते हैं, वह अपनी बहुत-सी विशेषताओं
के कारण हमें समझ में नहीं आता। हम कह चुके हैं कि इसका विकास हमारे बौद्धिक
परिवर्धन की उन अवस्थाओं से है जिनसे हम बहुत आगे बढ़ आए हैं, अर्थात्
चित्रलिपियो, प्रतीकात्मक सम्बन्धों, और सम्भवतः उन अवस्थाओं से है जो विचार
की भाषा का विकास होने से पहले मौजूद थीं। इस कारण हमने स्वप्नतन्त्र द्वारा
प्रयुक्त अभिव्यक्ति के प्रकार को अतिप्राचीन या प्रतिगामी कहा था।
इससे आप यह नतीजा निकाल सकते हैं कि स्वप्नतन्त्र का अधिक गहरा अध्ययन करके
हमारे बौद्धिक परिवर्धन की आरम्भिक अवस्थाओं के बारे में, जिनका इस समय कुछ
भी पता नहीं है, मूल्यवान निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। मुझे आशा है कि यही
होगा, पर इसका यत्न नहीं किया गया है। स्वप्नतन्त्र हमें जिस युग में
पहुंचाता है, वह दो दृष्टियों से 'आदिम' है : प्रथम तो इसका अर्थ है व्यष्टि
अर्थात् मनुष्य के आरम्भिक दिन, अर्थात् उसका बचपन; और दूसरे, जहां तक यह बात
है कि प्रत्येक व्यष्टि बचपन में, कुछ संक्षिप्त रूप में, मानव-मूलवंश के
परिवर्धन के सारे क्रम को दोहराता है, वहां यह निर्देश जातिचरित या वंशवृत्त1
का निर्देश है। मैं इस बात को असम्भव नहीं मानता कि हम गुप्त मानसिक
प्रक्रमों के उस भाग में जो व्यष्टि के आरम्भिक दिनों से सम्बन्ध रखता है, और
उस भाग में, जिसकी जड़ मूलवंश के बाल्यकाल में है, भेद कर सकते हैं। उदाहरण
के लिए, मुझे ऐसा लगता है कि प्रतीकात्मकता को, जो अभिव्यक्ति की ऐसी रीति है
जो कि कभी भी व्यष्टि द्वारा नहीं सीखी गई, मूलवंश की देन माना जाना चाहिए।
परन्तु स्वपनों की एक यही अतिप्राचीन या पुरानी विशेषता नहीं होती। आप सब
अनुभव से यह जानते हैं कि हम सबमें बचपन का स्मृतिनाश2 (एमनेंशिया) होता है।
मेरा मतलब यह है कि जीवन के आरम्भिक, अर्थात् पांच, छह या आठ वर्ष की आयु के
दिनों के हमारी स्मृति में वैसे अवशेष नहीं रहते जैसे वाद के अनुभवों के। यह
ठीक है कि हमें ऐसे लोग भी मिलते हैं जो बचपन से आज तक लगातार स्मृति का दावा
कर सकते हैं, पर उनकी तुलना में इसके विपरीत बहुत आदमी हैं, जिनकी
स्मृति में बहुत-से खाली स्थान हैं। मेरी राय में इस पर काफी आश्चर्य नहीं
पैदा हुआ। दो वर्ष की आयु का बच्चा अच्छी तरह बोल सकता है, और शीघ्र ही यह
सिद्ध कर देता है कि वह अपने-आपको उलझनदार मानसिक स्थितियों के अनकल बना सकता
है, और इसके अलावा ऐसी बातें कहता है जो वर्षों बाद उसके सामने पेश किए जाने
पर वह स्वयं भूल गया होता है और फिर भी आरम्भिक वर्षों में स्मृति अधिक दक्ष
होती है क्योंकि उस समय इस पर उतना बोझा नहीं होता जितना बाद में हो जाता है।
दूसरे, यह समझने का कोई कारण नहीं है कि स्मृति का कार्य मानसिक व्यापार का
कोई विशेष रूप से ऊंचा या कठिन रूप हो। इसके विपरीत, उन लोगों में भी बहुत
अच्छी स्मृति-शक्ति हो सकती है जो बुद्धि की दृष्टि से बहुत नीचे धरातल पर
हैं।
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1. Phylogenetic
2. Amnesia
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