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बड़ी बेगम

आचार्य चतुरसेन

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :175
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 9021
आईएसबीएन :9789350643334

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बड़ी बेगम...

गुलाबी दिन थे, वसन्त उमड़ रहा था, कोयल कूक रही थी।

बान्दी ने बादशाह के पास आकर कहा, "चलिए जहाँपनाह, आज मौका है!”

बादशाह जल्दी-जल्दी बान्दी के पीछे चल दिये। नूरजहाँ नज़र-बाग में सुबह की सुनहरी धूप में खड़ी गुलाब के फूलों को प्यार कर रही थी। ये गुलाब उसने बसरे, चमन और ईरान से मँगवाये थे। गुलाब का उसे शौक था। उसे मालूम

न हुआ कि बादशाह धीरे से उसके पीछे आकर खड़े हो गये हैं। बान्दी ने बादशाह को चुपचाप ऐसे ढंग से खड़ा कर दिया कि उनके सिर की परछाँही मलिका के कदमों में आ लगी। इसके बाद उसने आगे बढ़कर कोर्निश करके मलिका से कहा, "हुजूरे वाला, ज़रा इस तरफ मुलाहिजा फर्माइए तो! देखिए शहनशाह का सिर हुजूर के कदमों में है। अब तो आप गुस्सा थूक दीजिए!”

नूर ने पलटकर देखा तो बादशाह के सिर की परछाँही उसके कदमों में थी। उसने मुस्कराकर प्यासी आँखों से बादशाह की ओर देखा और जहाँगीर ने दौड़कर उसे गाढ़ आलिंगन-बद्ध कर लिया। दो तड़पते हृदय फिर एक हो गये, जो लाखों साधारण मनुष्यों से कहीं उच्च, उदार और आत्म त्यागी थे।

नूरजहाँ ने पति से मेल हो जाने की खुशी में हुक्म दिया कि आठ दिन तक रंगमहल में जलसे हों, रोशनी की जाए, नाच-रंग हों। इन आठ दिनों में बादशाह को जितनी वे चाहें शराब पीने की छूट भी दे दी गयी। बादशाह बाग-बाग हो गये। लाखों रुपये लुटाये गये।

नूरजहाँ ने बाग के तमाम हौजों और फव्वारों को अर्क-गुलाब से भरवा दिया और हुक्म दिया कि कोई उन्हें गन्दा न करने पाए।

वहाँ की एक संगमरमर की स्वच्छ पटिया पर नूरजहाँ रात की ठण्डी हवा के थपेड़े खाकर सो गयी। बान्दी और दासियों को उसे जगाने का साहस न हुआ। सुबह जब उसकी आँख खुली तो देखा-सामने जो हौज गुलाब-जल से भरा था, उसमें किसीने कुछ गन्दगी डाल दी है। कुद्ध होकर बान्दी से नूरजहाँ ने कहा, "यह कैसी चिकनाई है?” बान्दी ने कहा, "हुजूर, यह तो निहायत खुशबूदार है!” नूर ने जाकर देखा तो समझ गयी कि गुलाब की चिकनाई ही ओस की भाँति जम गयी थी। उसने उन्मत्त की भाँति उसे अपने वस्त्रों में खूब मल दिया। फिर वह दौड़ी हुई बादशाह की ख्वाबगाह में चली गयी। तातारी बान्दियाँ हट गयीं। खोजे सतर्क हो गये। उसने देखा बादशाह मीठी नींद सो रहे थे। नूरजहाँ बादशाह से लिपट गयी। उसने गुलाब की रूह का आविष्कार किया था, वह अपने उन्माद-युक्त यौवन से छलकते हुए शरीर को बादशाह के शरीर से रगड़ने लगी। बादशाह के सभी मनोरथ सफल हुए।

बाद में बेगम ने गुलाब की खेती बढ़ायी, और वह इत्र उन दिनों दिल्ली के बाजारों में सी रुपये तोला बिका।

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