पर व्यवधान तो मेरे जीवन में आके रहा और इतना बड़ा कि उसने एक लम्बी अवधि के लिए मुझे अपने घर-परिवार, परिवेश, देश से हज़ारों मील दूर ले जाकर बैठा दिया और इसकी शुरुआत एक बहुत छोटी-सी बात से हुई।
1951 के अन्त में ब्रिटिश कौंसिल की ओर से एक सूचना आयी जो अंग्रेज़ी विभाग के सब अध्यापकों को पहुँचाई गयी। ब्रिटिश कौंसिल का नाम उन दिनों नया-नया सुनने में आया था। ब्रिटेन ने भारत में ब्रिटिश कौंसिल की स्थापना भारत के स्वतन्त्र होने के बाद की थी। ध्येय स्पष्ट है, इस संस्था का यह था कि अग्रेज़ी के माध्यम से ब्रिटेन का जो सांस्कृतिक सम्बन्ध भारत के एक विशेष वर्ग के बद्धिजीवियों से बना है वह भारत के स्वतन्त्र होने के पश्चात टटने या क्षीण होने न पाये, बल्कि पूर्व राजनैतिक सम्बन्ध के टूट जाने पर तो उस सांस्कृतिक सम्बन्ध को और सुदृढ़ किया जाये। इसके दूरगामी राजनैतिक परिणाम भी हो सकते थे, इसे निश्चय ही अंग्रेज़ नीति-विचक्षणों ने देख लिया होगा। इसके अन्तर्गत प्रतिवर्ष बहुत-से अंग्रेज़ विद्वान् भारत आते हैं और यहाँ के प्रख्यात विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देते हैं, इसकी ओर से सभी बड़े-बड़े नगरों में अंग्रेज़ी के पुस्तकालय और वाचनालय चलाये जाते हैं जहाँ नया-से-नया अंग्रेज़ी साहित्य और नयी-से-नयी पत्रिकाएँ पढने को उपलब्ध रहती हैं।
सूचना यह थी कि ब्रिटिश कौंसिल कुछ अंग्रेज़ी के अध्यापकों को इंग्लैण्ड आने-जाने का खर्च देगी बशर्ते कि वे कम-से-कम दो टर्म यानी छह महीने के लिए किसी ब्रिटिश युनिवर्सिटी में अपने दाखिले का प्रबन्ध कर लें। वहाँ रहकर उन्हें युनिवर्सिटी के दर्जे पर अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने की विधि का अवलोकन करना होगा। रहना उन्हें अपने खर्च पर होगा जो छह महीने के लिए अनुमानतः करीब 3000/- रुपये के आयेगा, 500/- रुपये प्रतिमास के हिसाब से इंग्लैण्ड की सैर करने, उसके अन्य सांस्कृतिक पहलुओं से परिचित होने अथवा थोड़ा-बहुत योरोपभ्रमण के लिए 2000/- रुपये का अतिरिक्त प्रबन्ध रखना चाहिए, यानी कुल जमा 5000/- रुपये का इंतज़ाम हो सके तो इस अभियान पर जाने की बात सोची जा सकती है।
विभाग के अध्यापकों ने यह सूचना एक कान से सुनी और दूसरे से निकाल दी, पर मेरे मन में इस पर एक तरह की खिचड़ी पकनी शुरू हो गयी। कोशिश करूँ तो क्या यह सम्भव नहीं है कि मुझे छह महीने के लिए किसी ब्रिटिश यनिवर्सिटी में दाखिला मिल जाये? दाखिला मिलने पर प्रार्थना-पत्र भेजें तो क्या यह सम्भव नहीं है कि ब्रिटिश कौंसिल मुझे इंग्लैण्ड आने-जाने का खर्च दे दे, विभाग से तो और कोई जाने का इच्छुक नहीं, और युनिवर्सिटियों से चुनाव करने में इलाहाबाद युनिवर्सिटी की उपेक्षा शायद ही की जा सके। खर्च? आर्थिक स्थिति ऐसी तो नहीं है कि 5000/- रुपये बैंक से निकालकर चल +, कुछ जमा है तो बड़े होने पर भतीजे और बेटों की शिक्षा पर व्यय करने के लिए उसे नहीं छूना। पर कोशिश करने पर क्या यह सम्भव नहीं है कि कहीं से इतनी राशि मिल जाय, प्रकाशक ही अग्रिम रायल्टी दे सकता है। युनिवर्सिटी से छुट्टी मिल जायेगी, नियमानुसार दस वर्ष की सेवा के बाद दस महीने की स्टडी-लीव सवेतन मिल सकती है। मुझे तो छह मास की ही चाहिए। वेतन से मेरी अनुपस्थिति में घर का खर्च चल जायेगा। घर की देख-संभाल? उसके लिए मैं क्या करता हूँ? एक तिनका तो मैं खिसकाता नहीं। जो कुछ करने को है वह तेजी ही करती हैं। फिर राजन तो अभी यहाँ हैं ही, कानून की परीक्षा पास कर लेने पर भी वे ट्रेनिंग के लिए यहाँ कुछ दिन और रहेंगे। अगर मैं इंग्लैण्ड जा सका तो मैं अंग्रेज़ी साहित्य को पढ़ाने की विधि का अध्ययन तो करूँगा ही, एक काम और कर सकता हूँ। ईट्स पर शोध का जो काम मैंने दस वर्ष पहले शरू किया था वह अधरा पड़ा है। वहाँ प्राप्य सामग्री के आधार पर विस्तृत नोट्स ले सकता हूँ और भारत लौटकर पी-एच०डी० के लिए, अगर काम ज़्यादा अच्छा कर सका तो डी० लिट० के लिए, थीसिस प्रस्तुत कर सकता हूँ। डॉ० दस्तूर ने ऐसे ही डॉक्टरेट ली थी- महाजनो येन गतः स पंथः।