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जीवनी/आत्मकथा >> बसेरे से दूर

बसेरे से दूर

हरिवंशराय बच्चन

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :236
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 665
आईएसबीएन :9788170282853

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आत्म-चित्रण का तीसरा खंड, ‘बसेरे से दूर’। बच्चन की यह कृति आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है और इसकी गणना कालजयी रचनाओं में की जाती है।


मेरा ध्यान डॉ० राजेन्द्र प्रसाद की ओर गया- राष्ट्रपति ही थे, क्या नहीं था उनकी ताकत में ! उनकी स्मरणशक्ति अद्भुत थी। एक बार मुजफ्फरपुर के सुहृद संघ द्वारा आयोजित कवि-सम्मेलन का मैंने सभापतित्व किया था और राजेन्द्र बाब उसका उद्घाटन करने आये थे। इतने परिचय के आधार पर, सात-आठ साल बाद जब वे इलाहाबाद युनिवर्सिटी की डायमण्ड जुबली के अवसर पर आये तो उन्होंने मुझे देखते ही पहचान लिया और नाम से बुलाया। मैंने उनके निजी सचिव से उनसे मिलने का समय माँगा तो दूसरे ही दिन मिल गया। राजेन्द्र बाबू शिष्टाचार और विनम्रता की मूर्ति थे। उन्होंने ध्यान और सहानुभूतिपूर्वक मेरी समस्या सुनी। चलते समय उन्होंने कहा कि सम्बद्ध अधिकारियों से पुछवाकर वे मुझे सूचित करायेंगे कि मेरे लिए क्या किया जा सकता है। जहाँ तक मुझे स्मरण है, उनके निजी सचिव का उत्तर आया था कि इस सम्बन्ध में तो शिक्षा-मन्त्रालय ही कुछ सहायता कर सकता है, जहाँ से मुझे एक बार निराशाजनक उत्तर मिल चका था ! प्रजातन्त्र में राष्ट्रपति की शक्ति की भी कछ सीमाएँ हैं इसका प्रथम बार आभास हुआ। उन दिनों जो लोग राष्ट्रपति से मिलते थे, दूसरे दिन उनके नाम अखबारों में छप जाते थे। दिल्ली की मेरी उस यात्रा की उपलब्धि केवल यह थी कि दूसरे दिन राष्ट्रपति से मिलने वालों की सूची में मेरा भी नाम था।

दिल्ली से बहुत हताश और खिन्न लौटा।

तेजी को सुनना पड़ा, बहुत कहती थीं, दिल्ली जाओ, दिल्ली जाओ, लाफर लूटकर लाया हूँ दिल्ली से!

तेजी ने कहा, 'तुम सही आदमी से मिले ही नहीं। तुम्हें पण्डित जवाहरलाल नेहरू से मिलना था। तुम उन्हें पत्र लिखकर मिलने का समय माँगो, और मेरे कहने से एक बार और दिल्ली जाओ। मेरा मन कहता है, वे तुम्हें निराश नहीं करेंगे। और अगर उन्होंने भी कुछ न किया तो तीन हज़ार का इन्तज़ाम हम अपने पास से किसीन-किसी तरह कर लेंगे, तुम ब्रिटिश कौंसिल को लिख दो कि तुमने उनकी दोनों शर्ते पूरी कर ली हैं, अब वह तुम्हें मार्ग-व्यय भेज दे। छह महीने केम्ब्रिज रहकर लौट आओ, ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी को लिख दो कि किसी कारण तुम वहाँ न जा सकोगे। सपनों को सदा ही वास्तविकताओं से समझौता करना पड़ता है।'

पण्डितजी से मेरे मिलने के अवसर इने-गिने थे।

फिर भी मेरा कवि-रूप कहीं उनकी स्मृति में जमकर बैठ गया था। दो वर्ष पूर्व मेरे केवल एक बार लिखने पर उन्होंने मेरी 'मधुशाला' के अंग्रेज़ी अनुवाद के लिए प्रस्तावना लिख दी थी।

मैंने पत्र द्वारा उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की तो उन्होंने मुझे दिल्ली बुला लिया। पार्लियामेण्ट हाउस के अपने दफ्तर में मुझसे मिले। मैंने अपनी समस्या उनके सामने रखी, अपने प्रयत्नों की असफलताओं की कहानी भी सुना दी। उन्होंने बड़े ध्यान और धैर्य से मेरी बातें सुनी-आधे घण्टे का समय तो उन्होंने दिया होगा मुझे। अन्त में उन्होंने अपने निजी सचिव श्री बी० एन० कौल को बुलवाया और बड़े सहज भाव से आदेश दिया कि मेरे लिए 8000/- ब्लाक ग्रांट की व्यवस्था करा दी जाये। मैं उनकी उदारता पर अवाक् रह गया। लड़कपन में पढ़ी एक पंक्ति दिमाग में कौंध गयी :

जिसको न दे मौला
उसको दे आसफुद्दौला।

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