जीवनी/आत्मकथा >> बसेरे से दूर बसेरे से दूरहरिवंशराय बच्चन
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आत्म-चित्रण का तीसरा खंड, ‘बसेरे से दूर’। बच्चन की यह कृति आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है और इसकी गणना कालजयी रचनाओं में की जाती है।
मैं पण्डितजी को धन्यवाद देकर उनसे विदा लूँ कि बज़र आ गया, बोले, 'रुको, मौलाना साहब आ रहे हैं, उनसे मिल लो, तुम्हें तो कुछ देने से इनकार कर दिया था न!-कुछ व्यंग्य, कुछ विनोद, कुछ शरारत की-सी मुद्रा में। इतने में मौलाना साहब कमरे में दाखिल हुए। पण्डितजी उनको सम्बोधित करते हुए बोले, 'आइए मौलाना, ये बच्चन साहब हैं, हिन्दी के शायर, अंग्रेज़ी के लेक्चरर इलाहाबाद युनिवर्सिटी में, अपने रिसर्च के सिलसिले में केम्ब्रिज जा रहे हैं जैसे इलाहाबाद और केम्ब्रिज से अपने सम्बन्धो के प्रति वे सचेत हो।- और मौलाना साहब ने मुँह खोलकर कहा, 'बड़ी खशी से जायें, खशी-खशी वापस आयें।' मौलाना साहब ने अपने काले चश्मे के पीछे छिपी आँखों से यह ज़ाहिर भी न होने दिया कि अभी दो हफ्ते पहले मैं उनसे मिल चुका था। इसके पहले कि कोई असमंजस की स्थिति आये, पण्डितजी ने मुझे संकेत किया और मैं उन्हें प्रणाम और मौलाना साहब को सलाम कर विदा हुआ–'ब मुसल्मां अल्ला-अल्ला, बा बरहमन राम-राम।'
बाहर निकला तो कौल साहब ने मुझे बताया कि रिजर्व बैंक के कछ ऐसे नियम हैं कि 5000/- से अधिक विदेशी मुद्रा मैं बाहर न ले जा सकूँगा, इसलिए अभी वे मुझे केवल 5000/- का चेक दिलाने की व्यवस्था करेंगे, शेष 3000/- वे दो सौ पौण्ड की शक्ल में बाद को हाई कमीशन ऑफ इण्डिया- इण्डिया हाउसके द्वारा भिजवा देंगे।
दिल्ली से लौटा तो कुछ भारीपन, और कुछ हल्कापन साथ-साथ अनुभव करता- भारीपन, पण्डितजी के प्रति कृतज्ञता के भार से, हल्कापन, एक भारी आर्थिक चिन्ता के दूर हो जाने से।
केम्ब्रिज-ऑक्सफोर्ड में प्रवेश पा लेने की सूचना मैंने पहले ही ब्रिटिश कौंसिल को दे दी थी, वहाँ रहने की आर्थिक व्यवस्था कर लेने की सूचना भी दे दी। न जाने क्यों मेरे मन में इस बात का पूरा विश्वास था कि अब तो ब्रिटिश कौंसिल मुझे आने-जाने का खर्च दे ही देगी। यात्रा की तैयारी करने लगा। पासपोर्ट बनवा लिया, युनिवर्सिटी से पन्द्रह महीने की छुट्टी ले ली, जो दस महीने के लिए सवेतन और पाँच महीने के लिए अवेतन मिली। मुझे 15 अप्रैल को केम्ब्रिज उपस्थित हो जाना था, मध्य मार्च आ पहुँचा था, पर मार्ग-व्यय के सम्बन्ध में ब्रिटिश कौंसिल की ओर से कोई सूचना न मिली थी। सोचा, ब्रिटिश कौंसिल के दफ्तर में जाकर उसके सेक्रेटरी से मिलूँ और ठीक स्थिति का पता लगाऊँ। सेक्रेटरी महोदय जब एक बार इलाहाबाद आये थे, शायद वर्ड्सवर्थ की मृत्यु-शताब्दी के अवसर पर, तब उनसे मेरा व्यक्तिगत परिचय हुआ था।
उन दिनों ब्रिटिश कौंसिल का मुख्यालय आगरा में था। सेक्रेटरी मि० फिलिप से मिलकर मुझे ऐसा लगा कि जैसे मेरा व्यक्तिगत रूप से आकर उनसे मिलना कल अनुचित हो। बातें जो दो टूक हुईं उनका सारांश यह था कि ब्रिटिश कौंसिल ना चुनाव केवल इस बात पर निर्भर न होगा कि किसी को ब्रिटिश युनिवर्सिटी में दाखिला मिल गया है। तुरन्त मेरे मन की प्रतिक्रिया हुई-तो ब्रिटिश युनिवर्सिटी में मेरा दाखिला भी इस आधार पर नहीं हुआ कि ब्रिटिश कौंसिल मार्ग-व्यय देने के लिए मुझे चुनेगी। अर्थात्, मुझे उस हालत में भी इंग्लैण्ड जाने को तैयार रह चाहिए, जबकि ब्रिटिश कौंसिल मुझे मार्ग-व्यय न दे।
इंग्लैण्ड जाने के लिए मैं प्रतिबद्ध हो चुका था। मुझे कटिबद्ध भी होना था। मार्च के अन्त में ब्रिटिश कौंसिल से सूचना आयी कि इंग्लैण्ड भेजने के लिए मुझे नहीं चुना गया है। चुना भी नहीं जा सकता था। इसका रहस्य मुझे बाद को स्पष्ट हुआ, पर प्रसंग उठा है तो बात को यहीं कह दूँ। इंग्लैण्ड जाने के इच्छुक स्वयं ही विभाग के अध्यक्ष प्रो० एस० सी० देब थे, प्रयत्न भी कर रहे थे और इसकी कानों-कान उन्होंने किसी को न होने दी। चुना उन्हीं को गया था, गो वे गये कुछ विलम्ब से, अवधि भी इंग्लैण्ड में रहने की उन्होंने कुछ कम करा ली, थोड़े-थोड़े समय के लिए कई युनिवर्सिटियों से सम्बद्ध रहे, विशेषकर लन्दन से, कुछ दिनों के लिए केम्ब्रिज भी आये थे। उनको साथ लेकर मैंने ही उन्हें केम्ब्रिज की खास-खास जगहें दिखलाई थीं, पर वे अपने अध्ययन के आधार पर केम्ब्रिज के बारे में मुझसे कहीं ज़्यादा जानते थे। कुछ अंग्रेज़ी अध्यापकों की कक्षाओं में भी वे दर्शक के रूप में गये थे, गो उनकी शिक्षण-पद्धति से वे अधिक प्रभावित न प्रतीत हुए थे। मैंने उन्हें अपने निर्देशक मि० हेन से भी मिलाया था। अध्यापकों की एक गोष्ठी में, याद है, उन्होंने अपना एक बड़ा उपहासास्पद रूप उपस्थित कर दिया था।
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