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जीवनी/आत्मकथा >> बसेरे से दूर

बसेरे से दूर

हरिवंशराय बच्चन

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :236
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 665
आईएसबीएन :9788170282853

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आत्म-चित्रण का तीसरा खंड, ‘बसेरे से दूर’। बच्चन की यह कृति आत्मकथा साहित्य की चरम परिणति है और इसकी गणना कालजयी रचनाओं में की जाती है।


महीने में एकाध बार बकस-बिस्तर लेकर मेरा यात्रा पर जाना और दो-चार दिन बाद लौट आना मेरे बच्चों के लिए हस्ब-मामूल-सा हो गया था। कांगड़ा और कश्मीर की यात्रा तथा लखनऊ में छोटे भाई की बीमारी के समय में एक-एक महीने से अधिक घर से बाहर रहा था। सच कहूँ तो मेरे बच्चे मेरे घर से बाहर जाने का स्वागत करते थे, क्योंकि उन्हें मालूम था कि जब मैं लौटँगा, उनके लिए तरह-तरह की नयी चीजें-मिठाइयाँ, खिलौने आदि लाऊँगा। मेरे छोटे बेटे अजित ने, जिसे घर में हम बंटी कहते थे, पन्द्रह महीने की अवधि की लम्बाई की कल्पना शायद ही की हो, और उसने मेरे विदेश जाने की बात पर अपनी सहज, स्वाभाविक प्रसन्नता ही व्यक्त की-दो-चार रोज़ बाद मेरे खिलौने-मिठाई लिये लादे लौटने की तस्वीर आँखों में बसाये, गो बाद को मुझे पता लगा कि मेरी अनुपस्थिति का मानसिक तनाव उसी ने सबसे अधिक गहराई से अनुभव किया। उसके अन्दर एक प्रकार के भय और असुरक्षा की भावना घर कर गयी। वह रातों को सोते-सोते चौंकता-चिल्लाता, दिन को हर समय किसी-न-किसी के साथ रहने की ज़िद करता। उसकी भीति-कुण्ठा दूर करने के लिए तेजी को बड़े सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक उपाय करने पड़े। मैं इंग्लैण्ड से उसे Brave Boy Bunty-बहादुर बेटे बंटी-करके सम्बोधित करता, जिसका उसके ऊपर अच्छा प्रभाव पड़ा और थोड़े दिनों बाद वह अपने को अपनी माँ और बड़े भाई का संरक्षक समझने लगा। आज तो बंटी बहुत स्वस्थ, सुगठित और साहसी युवक है और उसे यह यकीन कराना भी कठिन है कि वह बचपन में इतना डरपोक था।

मेरा बड़ा बेटा अमिताभ ज़्यादा समझदार था, साढ़े नौ का हो गया था। उसने अवश्य यह महसूस किया कि मैं एक लम्बे समय के लिए घर से बाहर जा रहा हूँ, पर वह उम्र अदृश्य के प्रति आशंकित होने की नहीं होती। मैं विनोद में उससे कहता कि 'देखो, अब घर में सबसे बड़े मर्द तुम हो, तुम्हें अपनी माँ और छोटे भाई की देख-रेख करनी है', और वह अपने दायित्व, अधिकार और सामर्थ्य का प्रदर्शन-सा करता अपना सिर ऊपर उठाता, अपनी उम्र के औसत लड़कों से वह ज़्यादा लम्बा था ही, वह अपने को ऊपर खींच कुछ और लम्बा दिखाने का प्रयत्न करता, कन्धे पीछे कर छाती फुलाता-हँ...। और उसकी यह मुद्रा देख हम मुसकरा देते। उसके अन्दर का अभिनेता अपना संकेत देने लगा था, गो उसके भविष्य की हम अभी कल्पना भी नहीं कर सके थे। पर अपने महत्त्व का उसका बाल-गर्व प्रदर्शनमात्र न था। बाद को एकाधिक अवसरों पर उसने अपने दायित्व को सचमुच गम्भीरता से लिया और अपनी जैसी अवस्था के लड़के से अप्रत्याशित विवेक, सूझ-बूझ और कष्ट-सहिष्णुता का सबूत दिया।

तेजी ने इच्छा व्यक्त की कि वे मेरे साथ बम्बई तक जायेंगी और मुझे हवाई जहाज़ में बिठलाकर वापस आयेंगी। और यह एक तरह से अच्छा ही हुआ। बम्बई पहँचकर मैं बीमार पड़ गया और तेजी ने ही मेरे लिए यात्रा का सामान जुटाया : पासपोर्ट पर रुपये जमा कराये, 12 अप्रैल को इण्डिया इन्टरनेशनल के हवाई जहाज से रवाना होने का टिकट खरीदा।

बम्बई में हम लाला कैलाशपत सिंहानियाँ के यहाँ ठहरे-जे० के० हाउस में। उनसे मेरा परिचय जमुनाप्रसाद सिंह ने कराया था। वे इलाहाबाद युनिवर्सिटी के छात्र थे, उम्र में मुझसे एक साल बड़े, वैसे ही पढ़ाई में एक दर्जे ऊपर, म्योर होस्टल में रहते थे–तन से लहीम-शहीम, बुद्धि से विचक्षण, पान, मधुपान, रसपान तीनों के समशौकीन-रस की रेंज अधर-सुधा-रस से काव्य-कला रस तक फैली। मेरी कविता के प्रेमी थे, इन्कमटैक्स विभाग में किसी ऊँचे पद पर थे। जहाँ कहीं उनकी पोस्टिंग होती, वे कवि-सम्मेलन कराते और मुझे निमन्त्रित करते। एक साल जब वे बम्बई में थे, उन्होंने जे० के० हाउस में कवि-सम्मेलन कराया था और मुझे बलाया था। तभी मैं लाला कैलाशपत के सम्पर्क में आया था। उनकी दो पुत्रियाँ मंगला और शंकरा मेरी कविता पर मुग्ध थीं, उन्होंने मुझे अपना धर्म-बन्धु बना लिया था और हर वर्ष रक्षा-बन्धन पर वे मुझे राखी भेजती थीं-वह सम्बन्ध हमारा आज तक बना है।

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