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ऐतिहासिक >> विराटा की पद्मिनी

विराटा की पद्मिनी

वृंदावनलाल वर्मा

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :264
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7101
आईएसबीएन :81-7315-016-8

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वृंदावनलाल वर्मा का एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक उपन्यास...

:४२:

कुंजरसिंह मुसावली में एक अहीर के घर ठहर गया था। घर से लगा हुआ काँटों की बिरवाई से घिरा एक बेड़ा था, उसमें कुंजरसिंह घोड़ा बाँधकर स्वयं घर के एक कोने में
अकेला जा बसा।

बिरवाई से लगे तीन-चार महुए के पेड़ थे। महुओं के पीछे से एक चक्करदार नाला निकला था। दूसरी ओर वह पहाड़ी थी, जो मुसावली पाठा कहलाती है। एक ओर
बीहड़ जंगल। कुंजरसिंह महुओं के नीचे गया। अहीर की कुछ भैंसें नाले के पास चर रही थीं, कुछ महुए के नीचे ऊँघ रही थीं। एक लड़का कुछ धूप कुछ छाया में सोता हुआ जानवरों की देखभाल कर रहा था। 


घास आधी हरी, आधी सूखी थी। करधई के पत्ते पीले पड़-पड़कर गिरने लगे थे। नाले का पानी अभी नहीं सूखा था। कुछ भैंसें उसमें लोट-लोटकर शब्द कर रही थीं। चिड़ियाँ इधर से उधर उड़कर शोर कर रही थीं। सूर्य की किरणों में कुछ तेजी और हवा में थोड़ी उष्णता आ गई थी। कुंजरसिंह अपने घोड़े के सामने घास डालकर महुए के नीचे आया। जो भैंसें दूर पर बैठी ऊँघ रही थीं, यकायक उठ खड़ी हुई। चरवाहे की आँख खुल गई। पास में कुंजरसिंह को देखकर लड़के ने उठाई हुई लाठी को नीचा कर लिया। बोला, 'दाऊजू, सीताराम।' प्रणाम का उत्तर देकर कुंजरसिंह पेड़ की जड़ से टिककर बैठ गया। लड़का बिना किसी संकोच के एकटक कुंजरसिंह की ओर देखने लगा। उस चरवाहे के शरीर पर फटी हुई अँगरखी थी। घुटन्ना चढ़ाए मैला अंगोछा पहने था, आँखों में एक निर्मल, निर्भय दृढ़ता थी।

कुछ देर टकटकी लगाने के बाद बोला, 'दाऊजू, अबै दर्शन नईं भए का?'

लड़के की सहज, सरल निर्भयता और प्रश्न की विचित्रता से जरा आकृष्ट होकर कुंजरसिंह ने प्रश्न किया, 'किसके दर्शन भाई?'

'एल्लो! हमई से टिटकरी करन आए! दर्शन खों नई आए, इतै तो कायके लानै आए इत्ती दूर सें? संसार-भर के राजाराव नित्त आउत रहत।'

लड़के के बेधड़क संबोधन से कुंजरसिंह जरा चकराया, क्योंकि महल और किले के वातावरण में इस तरह की स्वच्छता उसने नहीं देखी थी। उसकी समझ में प्रश्न नहीं आया था, परंतु उस प्रश्न ने किसी गुप्त कौतूहल को जाग्रत किया। कुंजरसिंह उपेक्षा के भाव को छोड़कर बोला, 'हम कितनी दूर से आए हैं, तुम्हें मालूम है?'

'पालर सें।' 'अच्छा, बतलाओ, हम किसके दर्शन के लिए आए हैं?' 'जीके दर्शनखों हमाओ दद्दा कभऊँ-कभऊँ जात। कओ दाऊजू, हमने जान लई के नईं? हमखों काऊ ने नई बताई, पै हम तो जान गए।'

कुंजरसिंह चौंक पड़ा। पालर से आना तो उसने ही चरवाहे के पिता को बतलाया था, परंतु आने का प्रयोजन उसने कुछ और ही जाहिर किया था। कुंजरसिंह को अनुमान करने में विलंब नहीं हुआ कि किसके दर्शन की ओर लड़के का भोला संकेत था। उससे कहा, 'तुम्हारे साथ चलेंगे, कब जाओगे?'

लड़के ने उत्तर दिया, 'जब चाए, तब। कौन दूर है? इतै से दो कोस तो हेई। हमाई एक भैंस के दूध नई निकरत सो बिनती के लाने कालई-परों जैहें। तुम जो कछू माँगो सो
तमें सोऊं मिल जैहे।'

कुंजरसिंह के हृदय में गुदगुदी पैदा हुई। उसने कल्पना की कि पूजा और वरदान का स्थान एक कोस पर विराटा ही है। पूरा पता लगाने के प्रयोजन से पूछा, 'रास्ता क्या बहुत बीहड़ में होकर है? यहाँ से तो मंदिर दिखाई नहीं देता।'

'पाठ पै होकें सब दिखात है।' लड़का बोला, 'विराटा की गढ़ी दिखात और देवी को मंदिर दिखात। ठीक नदी के बीच में विराजमान हैं। ए दाऊज, हमने जब पैलउपैल देखौ तब आँखें मिच गई हतीं। उनके नेत्रन में से झार सी निकर रई हती।'

कुंजरसिंह को विश्वास हो गया कि यह वर्णन कुमुद का ही है। तो भी और अधिक जानकारी पाने की गरज से कहा, 'कब से आई हैं यह देवी?'

'सदा सें।' लड़के ने चकित होकर जवाब दिया, 'उनकी कछू आद अंत थोरक सौ'


इसके बाद उस सीधे लड़के ने देवी की करामातों की गिनती का तांता बाँध दिया। वह कहता गया। कुंजरसिंह कुछ और सोचने लगा-सदा से ही यहाँ पर हैं? यह असंभव है। यदि वही हैं, तो उनको आए कुछ ही दिन हुए होंगे। परंतु यदि नहीं होती, तो लड़का सदा से यहीं रहने की बात न करता। शायद कोई और हो। शायद यह और ही कोई अवतार हो। जो कुछ भी हो, एक बार दर्शन अवश्य करूंगा।।

कुंजरसिंह ने लड़के से उक्त देवी के विषय में और भी अनेक प्रश्न किए, परंतु उसे कोई अभीष्ट उत्तर न मिला।

निदान उसने लड़के के पिता से पूछताछ करने का निश्चय किया। चिड़ियों की विभिन्न प्रकार की चहचहाट और अपनी दुर्दशाओं की विशृंखल गणना में कुंजरसिंह ने संध्या तक का समय किसी तरह व्यतीत किया। सूर्यास्त के पहले दूर के खेत पर से गृहस्वामी जब आया, तब कुंजरसिंह ने अवसर प्राप्त होते ही उससे कहा, 'देवी के दर्शन करके मैं यहाँ से दो-चार दिन में चला जाऊँगा।'

कृषक बोला, 'सो काए? ऐसी का जल्दी परी दाऊजू? जो कछु लटौ-दबरौ कनका, हमाये गाँठ में है, सो नजर है। हमसे ऐसी का बिगरी कि अबई जावी हो जै है?'

कषक के इस सरल और सच्चे आतिथ्य-हठ से कुंजरसिंह का जी भर आया। घर पर चढ़ी हई कदुए की बेलों को देखते हुए कुंजरसिंह ने कहा, 'माते हम तो सिपाही हैं, न जाने अभी कहाँ-कहाँ भटकना पड़े। देवी के दर्शन करके कार्यसिद्धि के पीछे यदि बचे रहे तो फिर तुमसे आकर मिलेंगे।'

'जैसी मर्जी।' अहीर ने कुछ उदास होकर कहा। एक क्षण के बाद बोला, 'मैं परों दर्शन करबे जैहों, तबई चलबौ होए। आजकल बड़ी हूला-चालौ मची है। कछू इतै बनौ रैवो हुईये, तो मडैया बची है।'

किसान के इस प्रकट स्वार्थ पर कुंजरसिंह क्षुब्ध नहीं हुआ। उसने विश्वास दिलाते हुए कहा, 'अच्छा।'

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