Shodh - Hindi book by - Taslima Nasrin - शोध - तसलीमा नसरीन
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शोध

तसलीमा नसरीन

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :184
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3010
आईएसबीएन :81-8143-133-2

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तसलीमा नसरीन का एक और पठनीय उपन्यास

 

1


चार दिनों से यही हाल है। मैंने गौर किया, भोर-भोर नींद टूटते ही, कोई चीज नसों में गोल-गोल घूमती हुई, ऊपर उठने लगती है। मैं तन-मन की भरपूर ताक़त लगाकर, उसे जितना भी नीचे धकेलने की कोशिश करती हूँ, उतना हो मेरी कोशिश पर व्यंग्य करते हुए, वह चीज़ ऊपर...और ऊपर उठते-उठते, एकदम से जुबान को छूने लगती है, समूचे मुँह में भर जाती है। गले में खट्टे-खट्टे स्वाद का अहसास! आख़िर दौड़कर बाथरूम में जाकर उकइँ होना पड़ता है। इसके अलावा, दिन में भी आँखों के आगे, समूची दुनिया-जहान कम नहीं घूमती। पत्रिका पढ़ रही हूँ, खाना पका रही हूँ या बरामदे में उदास खड़ी हूँ-अचानक आँखों के सामने सारा कुछ गोल-गोल घूम जाता है। तब किसी चीज़ का सहारा लेना पड़ता है या बैठकर या लेटकर, चक्कर खाती हुई दुनिया को शान्त करना पड़ता है। नहा-धोकर, नाश्ता-पानी निपटाने के बाद, हारुन दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहा था। उसने हारुन को अपनी हालत वताई। यह बताते हुए, उसके होठों की कोरों में टुकड़ा-भर लजाई-शर्माई-सी मुस्कान भी झलक उठी। उस मुस्कान पर हारुन की नज़र नहीं पड़ी, क्योंकि उस वक़्त वह आली टाई बाँध रहा था और उसकी आँखें आईने पर गड़ी थीं। जब मैंने देखा कि मेरा सिर चकराने, उबकाई आने और उल्टियाँ करने की खबर सुनकर भी, हारुन ने आईने पर से अपनी आँखें नहीं हटाईं, मुझे चूमने के लिए नहीं बढ़ा, मुझे बाँहों में नहीं लिया, अपनी बाँहों में लपेटकर उल्लसित नहीं हुआ और मुझे सीने से चिपटाकर समूचे कमरे में नाच नहीं उठा, तो उसके होठों की मुस्कान, धीरे-धीरे विलीन होने लगी। बाँहों के झूले में उठाकर नाचने का मन्ज़र, मैंने पहली बार, शिप्रा के घर में देखा था।

उसे चौंका देने के इरादे से मैं पाँव दबा-दबाकर, उसके कमरे की तरफ़ जा रही थी कि मैंने देखा, दीपू, उसका पति, शिप्रा को बाँहों में लपेटे, समूचे कमरे में चक्कर लगा-लगाकर नाच रहा था। उस आकर्षक दृश्य को देखकर, उसके मन में भी चाव जागा था कि यह दुनिया बेहद खूबसूरत है, काश, इस दुनिया में हजारों साल जीते रहने का मौक़ा मिल जाता। दीपू ने जब अपनी बाँहों के बिस्तर से शिप्रा को उतारा, शिप्रा ने मुझे खींचकर कमरे के अन्दर कर लिया। दीपू उसकी बग़ल में ही खड़ा था। शिप्रा ने बताया कि जब उसने दीपू को खुशनवरी सुनाई, तो उसकी आँखों में उल्लास मानो उमड़ पड़ा था। आजकल सुबह-सुबह उसे उबकाई आती है, यह सुनकर दीपू खुशी से नाच उठा। उस दिन दीपू दफ़्तर नहीं गया। दिनभर घर में जश्न मनाता रहा। मैं मुग्ध निगाहों से उसे निहारती रही। जब वे दोनों हँस-हँसकर एक-दूसरे पर ढलके पड़ रहे थे, मैं मन्त्रमुग्ध होकर उन दोनों को देखती रही।

वैसे टाई बाँधने में हारुन इतना अनाड़ी नहीं था कि कोई शब्द या वाक्य उसके कानों तक न पहुँच पाए या उसकी आँखें, किसी का क़रीव खड़ी होना न देख पाए। टाई बाँधने की उसकी लगन देखकर, मैंने तटस्थ भाव से अपने को वहाँ से हटा लिया। हर रोज की तरह, चाँदी के टिफ़िन-डिब्बे में उसके लिए दो पीस डबलरोटी, दो उबले अंडे और सेब रखकर, उसके ब्रीफ़केस में रख दिया। मेरी बात उसने शायद सुनी नहीं, यह सोचकर मैं दुबारा हारुन के सामने आ खड़ी हुई। हारुन उस वक़्त टाई बाँधकर, अब जूते पहन रहा था। हालाँकि इतनी लगन से जूते का फीता वाँधते हुए, मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था। फिर भी फीते बाँध लेने तक इन्तजार करने के बजाए, मैंने अपनी बात दुबारा दुहराई। पिछले चार दिनों से अपनी गिरी हुई तबीयत दुबारा बयान की। इस बार भी वह शर्माई-शर्माई-सी मुस्कान दुवारा मेरे होठों की कोरों पर आ बैठी और इस बार भी हारुन ने उसकी मुस्कान की तरफ पलटकर नहीं देखा। जूते का फीता वाँध लेने के वाद, मेरे मन में फिर एक उम्मीद जागी कि अब वह मुझे चौंकाते हुए, वह मेरा हाथ पकड़कर, मुझे खींचते हुए घर के बाहर ले जाएगा, गाड़ी में बिठाकर समूचे शहर का चक्कर लगाता फिरेगा; दफ्तर में फोन करके कहेगा, आज वह दफ्तर नहीं जाएगा, क्योंकि आज उसके लिए बेहद सुखद दिन है या घर में ही मुझे गोद में उठाकर नाचना शुरू कर देगा; घरवालों को आवाज़ देकर ख़ुशखबरी सुनाएगा। इसके बाद, आने वाले बच्चे की सूरत कैसी होगी, बच्चे का नाम क्या होगा, इस बारे में बोलते-बतियाते, वह पूरा दिन गुज़ार देगा। जैसे पहले-पहले दिन दीपू ने किया था। बहरहाल, अपने जूते का फीता बाँधकर हारुन ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। दफ्तर का काला बैग हाथ में लिए-लिए, वह दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गया। मेरे होठों पर दूसरी बार जो मुस्कान आ विराजी थी, वह ग़ायब हो गई। यह सिर घूमना, उल्टी होना, आम सिर घूमने और उल्टी जैसा नहीं है, यह इशारा देते हुए, हारुन इस बार भी सुन न पाए, ऐसा कोई कारण न घटे, इस अन्दाज़ में मैंने अपनी आवाज़ काफ़ी ऊँची करते हुए, तीसरी बार कहा, 'नहीं समझे, ऐसा क्यों हो रहा है? किस बात का लक्षण है यह?'

आगे....

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    अनुक्रम

  1. एक
  2. दो
  3. तीन
  4. चार
  5. पाँच
  6. छह
  7. सात
  8. आठ
  9. नौ
  10. दस
  11. ग्यारह
  12. बारह
  13. तेरह
  14. पन्द्रह
  15. सोलह
  16. सत्रह
  17. अठारह

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